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प्रश्नोत्तर P8-0018 · भाग 8

बाबूलाल को घर-परिवार की याद आ रही है। विचार तो चलते रहते हैं। कुछ यादें खींचती हैं, प्रभावित करती हैं। जब उन विचारों के साथ होता हूं तो बहुत भारी दुख होता है। क्या करूं?

इधर आ जा। अब तेरी स्थिति क्या है? घर की तो विचार तो चलते रहते हैं। विचार तो आते हैं। क्या वो विचार खींचते हैं? कोई ऐसी यादें हैं जो प्रभावित करती हैं, खींच रही हैं। तो बस उसी को हटाना है। बैठ जा ना, आराम से। कोई मुझे खींच रहा है, तो क्यों खींच रहा है? क्या मुझे चाहिए? क्या मुझे वो चाहिए? क्या वो चाहिए, तो किसको चाहिए? मुझे चाहिए। उसके बारे में चिंतन कर। वो पल की यादें वो मुझे क्या दे देंगी? क्या दी? उस पर चिंतन कर। कि जब मैं वहां था, उसमें जी रहा था, तो मुझे क्या दे दिया? अब मैं अगर जाऊंगा तो मुझे क्या देगा? विचार तो आएंगे ना। महात्मा बुद्ध को उपलब्धि हो गई। अपने पिता के घर गए ना। तो पिता याद थे ना? पुत्र याद था ना? घर याद था ना? यादें थोड़ी जाने वाली हैं। उन यादों में क्या दुख है? क्या मुझे? नहीं, मुझे नहीं। मैं भी परिवार की बात किया। लेकिन मुझे किसी भी व्यक्ति को लेकर कोई खिंचाव नहीं है। मेरे कोई भी घर का ऐसा कोई सदस्य नहीं है जिसके लिए मैं जाकर मिलूं। अगर मैं सुन जाऊं कि वह खत्म हो गए तो मुझे कुछ दुख नहीं होगा। अभी मैंने परिवार की बात की ना, तो परिवार याद था, तभी तो बात की। यादें कहीं जाने वाली नहीं हैं। क्या उन यादों में राग-द्वेष है? क्या वो यादें खींच रही हैं? जैसे सामने हम देखते हैं, कोई आदमी मुर्दा जाता है, तो हम कहते हैं इसकी आत्मा को शांति मिले। कुछ हमारे सामने घटना घट जाती है तो हम बाहरी तौर से देखते हैं, दुख हुआ, लेकिन वो दुख टिकता थोड़ी ना है। टिकता तो जब तुम्हारा होता है। जैसे कोई मुर्दा जा रहा है, तुमने कहा इसकी आत्मा को शांति दे। लेकिन पता चला पुत्र है, भाई है, तो दुख हो जाए। और नहीं जमता होगा तो, अगर तुम्हारी बर्बादी का कारण होगा, तुम्हारा भाई होगा, अलगाव हो गया होगा, कहोगे अच्छा हुआ गया। क्योंकि कुछ मिल नहीं रहा था ना। तो याद आएगी। देखना यह है कि क्या उन यादों में राग-द्वेष है? अभी तो क्या, ये अभी खेल नहीं निकली? हां, बहुत कम हुआ है। वो तो धीरे-धीरे। अब मेरा एक दिन में थोड़ी ना खत्म हुआ। मैं भी पागल की तरह दो हजार ग्यारह से बीस तक घूमा। एक-दो दिन में थोड़ी छूटता है भाई। पत्थर पर रस्सी निशान कर देती है, तो एक दिन में थोड़ी ना कर देती है। सालों लगते हैं ना रे। तो कोई यादें हैं। उन यादों में मुझे कुछ मिला है। तो जब हम नहीं जाएंगे, फिर से मैं वही काम नहीं करूंगा, तो धीरे-धीरे छूट जाएगा। अब पता चला कि एक साल के बाद मैं जाकर दोहरा रहा हूं। दो साल के बाद दोहराया, तो ताजा कर दिया ना। भाई, एक मैंने अपराध कर दिया। मैं उसकी सजा काट रहा था। मैं दो साल सजा काट कर दूसरा अपराध कर दिया। तो दूसरे अपराध का भी तो दंड लग गया। नहीं तो भैया, जितना पुराना किया, जितना पुराना है, बैठ जाने दे उनको। याद आ रही है तो आने दो। यादें सताएंगी, एक दिन छूट जाएंगी। और जिंदा हो या मुर्दा, सब छूट ही जाएंगे। एक दिन हम, आप बात कर रहे हैं, हो सकता है मैं तुमसे पहले निकल जाऊं या तुम निकल जाओ। हम भी छूटने वाले हैं। ये शरीर छूटने वाला है। और तुम भी छूटने वाले हो। लेकिन ईमानदार बनके जाओ। मेरा यही कहना है। कब, अगला शरीर। हो सकता है कि तुम जब नियम तोड़ रहे हो उसी समय शरीर छूट जाए, तो क्या होगा? बेईमान बन के गए। पता है क्या? कौन सा क्षण तुम्हारा आखिरी होगा, तुम्हें पता है? इसलिए हर क्षण ईमानदारी से जियो। हर क्षण में ईमानदार रहो। पता नहीं अगला क्षण तुम कहां होगे, मैं कहां होऊंगा। इसलिए जिसके साथ हो, पूरी ईमानदारी से जियो। ईमानदारी और सत्कर्म से ही आपका उद्धार होगा। तो याद तो आती है। याद में खिंचाव क्यों है, वो देखना है। जिसके लिए खिंचाव है, क्या उससे मेरा कुछ कल्याण होगा, कि उससे मेरा पतन होगा? तो मैं अपना पतन करवाने क्यों जाऊं? जब तक समझ नहीं थी तब तक किया। अब तो समझ आ गई, तो फिर क्यों करवाऊं? तो याद तो आएगी, बाबूलाल। ऐसा नहीं कि याद नहीं आएगी। हमें भी अपने भाई-बहन की यादें आती हैं, लेकिन वह यादें कभी सताती नहीं हैं। मैंने कहा ना, अगर मुझे अभी खबर मिल जाए कि कोई निकल गया तो ठीक है, निकल गया। बस। उन यादों में एक पीड़ा है। वह नहीं होना चाहिए। और पीड़ा क्यों है? क्योंकि कुछ चाहिए उससे। पीड़ा यह है कि उससे कुछ चाहिए, या तो वो सुरक्षित रहे। सुरक्षित इसलिए रहे कि वो मुझे कुछ दिया है। तो यादें नहीं खत्म होने वाली हैं। आप ये ना सोचना कि यादें खत्म हो जाएंगी। यादें नहीं खत्म होंगी। दर्द ना हो। राग और द्वेष ना हो। कोई खिंचाव ना हो। यादें तो सब आएंगी, और भी आएंगी, क्योंकि खाली हो ना। अगर किसी काम में रहते तो यादें कम होतीं। अब पूरी तरह तुम स्वतंत्र हो। कोई जिम्मेदारी नहीं है। बहुत झटपटाते हो, क्योंकि पूरा खाली हो। पूरा खाली हो। पूरा आत्मिक कल्याण का आपको मौका मिला है। जितनी जिम्मेदारी है, गुरु जाने कैसे चलेगा। तुमको थोड़ी टेंशन है। तुम्हें टेंशन रहता तो यादें कम आतीं। तुम्हें कोई चिंता भी नहीं है, फिक्र भी नहीं है। कोई अगर व्यवस्था की जिम्मेदारी मिली होती तो तुम्हें यादें कम आतीं। लेकिन अभी तो खूब आएंगी। रात-दिन आपको काम ही क्या है? आपको काम क्या है? अतीत की यादें ही तो आएंगी। जेल की तरह लगने लगे। लेकिन जहां याद आ रही है ना, वही जेल था क्या? ये तो तुम मुक्ति के द्वार पर खड़े हो। एक कदम तुम्हारा बस उठा है। और एक कदम तुम्हारा वहां है। अगर ये कदम पूरा रख दो और वो उठ जाए तो बात खत्म। इस समय तुम मुक्ति के दरवाजे पर खड़े हो। एक कदम मुक्ति पर है और एक कदम तुम्हारा अतीत में है। अतीत से जिस दिन तुम्हारा सब छूट गया, उस दिन यह पांव उठेगा और तुम्हारा अगला कदम मुक्ति पर चला जाएगा। ये दर्द तो पूरा खत्म होगा। ये दर्द यहां का पूरा खत्म। ये जब खत्म होगा तभी आप पूरी तरह इसमें आ पाओगे। फिर इसके बाद फिर दर्द होगा? मतलब फिर दर्द क्यों? समाधि में कोई दर्द नहीं होगा। कोई दर्द नहीं होगा। दर्द तो तभी तक है जब तक ये दूसरा कदम यहां नहीं आया है। छोड़ने में दर्द हो रहा है, तो मिटेगा। सोचते मिट जाएगा। एकदम। तुम्हें यह देखना पड़ेगा। ज्ञान मिल रहा है, सत्संग मिल रहा है। ये देखना पड़ेगा कि देखो, ये भी तो ऐसे पड़े हैं। मैं ही थोड़ी ना अकेला हूं। इनको क्या मिल रहा है? और ये आनंद से पड़े हैं। पूरा स्वतंत्र हैं, तो भी कहीं नहीं जा रहे हैं। मैं तो मुक्ति के लिए यहां हूं। ये व्यक्ति किस लिए है? ये व्यक्ति तो मेरे लिए है। और यह व्यक्ति जब चाहे चला जाए तो भी नहीं जा रहा है यार। तो मैं क्या जाऊं फिर? आपसे लगाव तो हो ही जाए। मुझे यह देखना है कि यार, यह व्यक्ति यहां किसके लिए है? इस जंगल में किसके लिए पड़ा है? ये तो जब चाहे गाड़ी उठाए चला जाए। सारी व्यवस्थाएं भी हैं। लेकिन फिर भी यह जंगल में पड़ा है। किसके लिए पड़ा है? क्योंकि उसने मुक्ति पा ली और सोच रहा है तू भी पा ले। नहीं तो मैं जाऊं तो मुझे कोई रोकेगा क्या? मैं तो वहां भी रह के चला सकता हूं। मेरा काम तो हो गया। लेकिन क्या करूंगा जाके? आप लोग उस रास्ते पर हो, इसलिए मैं आपके साथ हूं। हम उनके साथ रह के क्या करेंगे? क्योंकि वही प्रपंच। उनको मुक्ति नहीं चाहिए, उन्हें माल चाहिए। तो उनके साथ रह के मैं क्या करूंगा? उन्हें माल चाहिए। उनको वही प्यारा है जो उन्हें माल दे। तो मैं तो उनके काम का हूं नहीं। तो मैं तो उनके लिए प्यारा हूं ही नहीं। तो मुझे यह देखना है कि मेरी जिंदगी है। यह सामने भी पड़ा है। मैं तो चलो, मुक्ति, मेरा कल्याण हो जाए, इसलिए हूं। यह किस लिए है? ये तो मुझे व्यवस्था देने के लिए यहां पड़ा है। तो मुझे जहां मैं हूं उसको भी देखना चाहिए। उससे मुझे प्रेरणा मिलती है ना। पूरा मन से आता है कि नहीं हटेंगे तो निश्चित ही पार हो जाएंगे। एकदम पार ही हो जाएगा रे। पार ही कर ले। पार ही कर लो अपने आप को। पार में ही उद्धार है। उद्धार में ही पार है। कैसे भी अपने आप को इस भवसागर से निकाल लो। बुद्धिमानी से, समझदारी से। इसमें चालाकी करो ना। चालाकी ही करना है तो अपने उद्धार में चालाकी करो ना। बुद्धिमान ही बनना है तो इसमें बन जाओ ना। उस परम स्थिति पर अपने आप को पहुंचा लो। तब आपकी समझदारी का मतलब है। तब आपकी बुद्धिमानी का मतलब है। तब आप बुद्धिमान व्यक्ति हो, चालाक हो।

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