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प्रश्नोत्तर P5-0084 · भाग 5

(गुरुद्वारा सेवक) अरदास में बीमारी-शादी आदि के लिए प्रार्थना करनी पड़ती है — ड्यूटी है। क्या करें?

मेन तो कर्म है। मुझे तो बस अपने आत्मिक कल्याण के लिए, और किसी के आत्मिक कल्याण के लिए अरदास करनी चाहिए। बाकी नहीं। और यह आप गुरु वाणी पढ़ते हो। गुरु नानक जी को हम भी प्रणाम कर रहे हैं। उन्होंने पहली और आखिरी बात यही कही है। सार यह है कि अगर प्रार्थना ही करनी है तो अपने आत्मिक कल्याण के लिए कर लो, या किसी और के आत्मिक कल्याण के लिए कर लो। गुरुद्वारा किसके नाम से बना है। गुरु के नाम से। गुरु नानक जी के नाम से। उनका कहना क्या था। मेन तो यही है कि अपना कल्याण करो। और इसके लिए तुम सत्कर्म करो। जरूरतमंद की सेवा करो। बस। तभी हम उनकी बात मानेंगे। इन लोगों की बात मानेंगे तो फिर तो हमें हटा दिया जाएगा। वहां से जाओ, और कुछ और करो। जहां रह के अगर मेरी नैया डूब रही है, मुझे अब उस भंवर में अपनी नैया को क्यों रखना। एक रोजी रोटी के लिए मेरे को यह क्यों करना। और कुछ करो। गुरु नानक जी के जीवन में कितना संघर्ष था। था कि नहीं था। तो हम फिर संघर्ष से क्यों भाग रहे हैं। हम क्यों संघर्ष से भाग कर बेईमानी को पकड़ रहे हैं। गुरु नानक जी ने तो यही कहा, अपने आत्मिक कल्याण के लिए काम करो। उसके लिए ईमानदारी से कर्म करो। परिवार चलाने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा, तो और कोई काम पकड़ लीजिए। घर पर बैठकर वही कर सकते हो जो सीखा है। बस निकालो। प्रार्थना करो कि मुझे पहले तो इस दलदल से निकालो, जहां से मैं डूब रहा हूं। क्योंकि मैं किसके लिए जन्म लिया था, और गुरु द्वारा किसके लिए बनाया गया था, और यहां क्या हो रहा है, क्या करवाया जा रहा है। गुरु नानक जी के मेन उद्देश्य पर काम करिए, जिससे कल्याण हो। यहां क्यों नहीं आते, कटोरा लेकर। वहां कटोरा लेकर आते हैं, क्योंकि उस कटोरे का किसी ने आश्वासन दे दिया है। चाहे जिस तरीके से। यहां क्यों नहीं आते। किसी ने आश्वासन दिया, तभी आए, कटोरा लेकर। मैं घटना बता रहा हूं। हम कार में बैठे थे, गुजरात में। कार के अंदर बैठे थे। हमारे पीछे दो लोग थे। तो दो बच्चे भीख मांगने आए। उन्होंने बाहर से मुझे देखा। पहले तो ऐसे किया। जब मुझे देखा तो हंसते हुए दोनों चले गए। मतलब उन्हें पता चल गया कि यह क्या भीख देगा, और मैं कार में बैठा हूं। गलती से मांग लिया। इसलिए मैं कपड़े नहीं बदलता। आपके पास कोई अगर मांगने आता है, तो आपने उम्मीद दी है। ऐसे नहीं आता है। यहां क्यों नहीं कोई आता। यहां इतनी भीड़ में एक व्यक्ति ऐसा बैठा है क्या, बताओ। क्यों नहीं बैठा है। क्योंकि यहां कोई आश्वासन नहीं है। अगर कटोरा ले कोई आ रहा है, इसका मतलब आपने उसे पहले आश्वासन दिया। दुकान आपने खोली, बाद में देखा, दुकान जैसी मैं चाहता था वैसी लग गई है, पहुंच जाओ। पहले आपने खोला। संकेत पहले आपने दिया। संकेत का तरीका अलग था। जैसे लोग कहते हैं कि यह महाराज जी हैं, किसी से मांगते नहीं, मिल गया तो खाए। तो गांव के बगल में क्यों रहते हैं। बीहड़ जंगल में चले जाएं। उन्हें पता है, गांव में कोई न कोई देगा। बाहरी रूप से मांग रहे नहीं, लेकिन आंतरिक रूप से मांग रहे हैं। उन्हें पता है कि गांव में कोई न कोई आकर भोजन पूछ ही लेगा। नहीं तो वे बीहड़ जंगल में क्यों नहीं चले जाते। जब कोई नहीं मांगता, तो चलो बीहड़ जंगल में चलते हैं। उसको देना होगा तो देगा, नहीं देगा तो नहीं। लेकिन बगल में गांव के हैं। कहते हैं, नहीं, यह तो महाराज किसी से खाते पीते नहीं। तब हम ऐसे लोग मिले, मांगते नहीं, किसी से मिला तो खा लिया, नहीं तो ऐसे भजन करते। क्या भजन कर रहा है। यह तो धरती पर बोझ है। किया क्या। मैं कह रहा हूं, ठाठ से जानवर अगर आपके दरवाजे पर बंधा है, कोई दूध नहीं दे रहा है, उसका गोबर भी काम में नहीं आ रहा है, तो ऐसा जानवर किस काम का। मेरा कहना है कि अगर कोई पड़ा है, आपको लग रहा है त्याग इसने किया, क्या वह तो पृथ्वी पर बोझ है। कम से कम ग्रहण तो कर ही रहा है। तो अलग अलग तरीके से मांगा जाता है। अगर आप कटोरा ले आ रहे हो, तो कटोरा वाले तब आए जब आपने उन्हें आश्वासन दिया। कटोरा वालों के पास इतना समय नहीं है। वे बहुत व्यस्त होते हैं, क्योंकि हर जगह तुम आओ, तुम्हारा कटोरा मैं भरूंगा, यह कहेंगे तुम। नहीं तो वह बुला रहा है मुझे। मैं तो कितनों को छोड़ के आया हूं। मेरा कटोरा भरने के लिए वह भी बुला रहा था, लेकिन मैंने तुम पर भरोसा किया। मतलब वह एहसान भी जताएगा, मैंने तुम पर भरोसा किया। मेरा यह कहना है कि आप देखिए, पहला व्यक्ति जिसने उसकी स्थापना की, उसने किस उद्देश्य से किया, वह देखिए। अगर वह देख के, अगर आप उसको देखकर वहां रहेंगे, तो आपका कल्याण होगा। आजकल शहरों में भी, गांव में भी, गुरुद्वारे बन रहे हैं, पार्टीबाजी चल रही है। अगर कुछ उसमें अपने आप को नहीं लगता, उनकी नहीं मिलती, तो एक नया स्थान खड़ा कर देते हैं। चलो, पांच सात जने मिलके, तो वह अलग हो जाता है। मैं आपको बता रहा हूं। गुरु नानक जी के पुत्र श्रीचंद हुए, तो बड़ा अखाड़ा बनाया गया। मैं उदासीन बड़े अखाड़े से संन्यासी हुआ। जहां आपने वीडियो देखा होगा, झगड़ा हुआ था। उदासीन बड़ा अखाड़ा था वह। वहां से मैं संन्यासी हुआ। लेकिन श्रीचंद किस मार्ग पर गए। तंत्र मंत्र पर गए। शाबर मंत्र का उन्होंने किया। वे गुरु नानक जी के मार्ग पर नहीं गए। वे अलग हो गए। तो मैंने देखा कि जिसके लिए मैं आया था, वह तो यहां नहीं है। जिसके लिए मैं यहां आया हूं, वह तो यहां नहीं है। आरती पूजा तक है। रिद्धि सिद्धि तक है। तो मैंने कहा, यह तो मुझे नहीं चाहिए। तो फिर मैं वहां से निकला। निकला, तो देखो, मैंने खड़ा कर दिया। आज इसका बेस मैं खुद हूं। आधार मैं खुद हूं। लेकिन मैंने छोड़ा उसे। तो यह खड़ा करने में मुझे फिर बारह साल भ्रमण करना पड़ा। इसका आधार, बेस, कोई और नहीं है। कोई संप्रदाय नहीं है। लेकिन मैंने जिसे धारण किया, अपने आत्मिक कल्याण के लिए, मैंने देखा वहां तो और कुछ हो रहा है। मुझे यह नहीं चाहिए। मैं तो आया था आत्मिक कल्याण के लिए। मैं उस परम सत्ता से मिलने आया था। यहां तो रिद्धि सिद्धि है। मुझे नहीं चाहिए। तो मैं वहां से हट गया। तो अगर आप गए हो तो देख लो। वहां अगर गड़बड़ हो रहा है तो आप हटो। उस झुंड को क्यों पकड़ रहे हो। छोड़ना तो पड़ेगा। तो मुझे भी बारह साल ऐसे भ्रमण करना पड़ा। अगर मैं नहीं हटता तो वहां तो बढ़िया था। हमारे गुरु जी बोलते थे, जिसको गुरु बोले, बढ़िया कपड़ा पहन ले, खाता भी पड़ा रह। और मैं आपको बताऊं, उस आश्रम में ऐसा है कि आप बाहर, गेट के बाहर भी निकलने की जरूरत नहीं है। सारी सुविधा उपलब्ध है। कभी गेट तक भी आने की आवश्यकता नहीं है। आप वहीं जाओ, और आखिरी में शरीर निकलेगा आपका। लेकिन है क्या। रिद्धि सिद्धि। वहां सारी व्यवस्था है। जंगल जैसा है। खाना, पीना, रहना, तेल, साबुन, सब। निकलोगे क्या। निकलने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। लेकिन मैं निकला। क्यों निकला। क्योंकि मैं उसके लिए गया ही नहीं था। और मैं भी उसके लिए गया होता तो मैं वहीं पड़ा रहता। मुझे यह देखना है कि मैं चाहे गुरुद्वारे में हूं। गुरुद्वारे में अगर आप हो तो देखिए, गुरु नानक जी के बताए हुए मार्ग पर वह चलाया जा रहा है क्या। उस स्थान को तो आप रहो, नहीं तो छोड़ दो। आप कोई स्थान का निर्माण करो। लेकिन जिसने उसकी स्थापना की है, हमें तो उसके बताए हुए अनुसार चलना है। तो आप देखो कि वह कर रहे हो कि नहीं। उनकी वाणी किसके लिए बोली जाती है। अपने आत्मिक कल्याण के लिए। या तो मेरे सामने वाला बैठा आत्मिक कल्याण के लिए सुन रहा है, तो नहीं। भौतिक कल्याण के लिए तो नहीं। और अगर मैं गुरुद्वारे में भौतिक कल्याण के लिए प्रार्थना कर रहा हूं, फिर मेरा क्या होगा। कोई रोजी रोटी कमाने के लिए, भाई किसी का बढ़ जाए, किसी की लड़की की शादी हो जाए, किसी का बिजनेस, व्यापार बहुत अच्छा चले। वाणी पढ़ के स्वर्ग दिला देंगे। मरे तो होता ही है। उसको तो पहुंचा देते हैं ऊपर, परमात्मा के पास। लेकिन ऐसा संभव नहीं है। तो फिर हम कौन से खेल कर रहे हैं। तब तो कहना पड़ता है, हमें इसको आवागमन के चक्र से मुक्त किया जाए। अब बताओ। कितनी बड़ी बेईमानी है। आपको लग रहा है वह आवागमन के चक्र से मुक्त हो गया। नहीं होगा। वह तो हमें भी मालूम पड़ता है। फिर मेरा क्या होगा। जिस दिन मैं खड़ा रहूंगा, और मेरा हिसाब किताब जब होगा, तो फिर क्या होगा। मैं अपने कर्म से कहां जाऊंगा। यह सब गलत हुआ है। आप खुद निर्णय लीजिए। क्या आप जिसकी विधि कर रहे हो, कि इसको मैं आवागमन से मुक्त करने के लिए यह विधि कर रहा हूं, तो क्या वह आवागमन से मुक्त हो गया। फिर क्या होगा आपका। मजबूरी में कहना पड़ता है। लेकिन यह बात उसे पता है क्या, करवाने वाले को। करवाने वाले को भी पता ही होता है, लगभग। फॉर्मेलिटी पूरी करनी है। उसे भी मालूम है कि नहीं मुक्त होंगे। तो आप उससे बोलिए कि भाई देखो, अगर कोई ऐसा आए तो बोल दो कि देखो, यह हम विधि कर दे रहे हैं, आवागमन से मुक्त होगा नहीं होगा, मुझे नहीं पता। यह तो कह देते हैं। जब हम कीर्तन में करते हैं, तो उनको सुनाते भी हैं कुछ कहानियां, तो उसमें भी कह देते हैं कि ऐसे जो आपने कर्म किए हैं, उसका कर्म का फल आपको भोगना ही पड़ेगा। तो विधि का क्या मतलब। यह भी सब सुना देते हैं। फिर विधि का क्या मतलब। विधि का तो वैसे यही है कि वह क्रिया कर्म जो है, संसार जब उसके कर्म से ही मिलेगा, तो उसके लिए फिर किया क्यों जा रहा है। वह तो लोकचाल है। बस इसको खत्म करना चाहिए। करना चाहिए, क्योंकि हमारी ऊर्जा और कहीं लगेगी। लोगों को यह भ्रम है कि इसका यह नहीं किया तो यह मुक्त नहीं होगा, या हमारे ऊपर ही आ जाएगा। लेकिन भ्रम को डालने वाला मैं तो हूं। भ्रम को बढ़ावा कौन दे रहा है। सभी लोग, अगर करने वाले ही खत्म हो जाएं, तो करवाने वाले तो अपने आप खत्म हो जाएंगे। जब मुझे लग रहा है कि यह करने से कुछ नहीं होगा, तो मुझे तो करना ही नहीं चाहिए। मैं वह विधि क्यों कर रहा हूं। मैं किसी के अंधविश्वास को बढ़ावा क्यों दे रहा हूं। कोई और कुछ करो। अब तो चिंतन में यही होगा। मेरी नौकरी पकड़ के चिंतन भी यही होगा कि अब करूंगा क्या। करेंगे क्या, क्योंकि यह पेट है। मेरे पेट के पीछे और पेट हैं। अगर यही पेट होता, तब तो यही रुक जाते। तो प्रार्थना करो कि मैं इससे निकलना चाहता हूं। कोई न कोई मार्ग मिलेगा निकलने के लिए। जहां तक मैंने समझा, जला देते हैं, वह भी ठीक करते हैं। शरीर का क्या करेंगे। ऐसे कहीं रखेंगे तो सड़ जाएगा। तेरहवीं भी कराते हैं, पूरी और वड़ी खिलाते हैं, वह भी अच्छा है। कम से कम लोगों को खिला तो रहे हैं, क्योंकि खिलाने से मानवता जगेगी। यहां तक ठीक है। लेकिन यह कि आवागमन से मैं मुक्त कर रहा हूं, ऐसा हो ही नहीं सकता। मैं खिलाने तक सही समझता हूं। जब से वीडियो सुनने लगे, तब से समझ आने लगी कि यह गलत कर रहे हैं। पहले तो यह हमारा पेशा ही था। पहले तो ऐसे ही करते थे। दिमाग में चिंतन भी नहीं था इस बात का कि यह गलत हो रहा है, कि हम आवागमन से मुक्त करवा रहे हैं। पहले ध्यान ही नहीं था इसी तरफ। यहां तक ठीक है, खिलाने पिलाने तक। लेकिन हम उस जीवात्मा को मुक्त कर रहे हैं। उसके नाम से खिला पिला दो। उसे कुछ मिले या न मिले, लेकिन आपके अंदर मानवता जगेगी। कुछ लोगों से मिलोगे, नई नई बातें होंगी, नए नए लोग मिलेंगे। यहां तक ठीक है। लेकिन यह विधि कि मैं उसे आवागमन से मुक्त करता हूं, वह फंसा हुआ है, मैं इस विधि से, और मुझे पता भी है ऐसा होगा ही नहीं। यह भी पता है। दोनों बात का पता है। ऐसा होगा भी नहीं। कर्म उसका जहां ले जाना होगा, ले जाएगा। और मैं कहानी में भी यही सुना रहा हूं। और फिर मैं विधि भी कर रहा हूं कि मैं आवागमन से मुक्त भी कर रहा हूं। मतलब क्या। कितना खिलाड़ी हूं मैं। इसलिए तो मैं कहता हूं, सब खेल खेले। और मैं फिर वह गुरु नानक जी के नाम से कर रहा हूं। गुरुद्वारे में कर रहा हूं। अब वह मुझे क्या बता के गए, और मैं उनके नाम से क्या कर रहा हूं। जितने भी महान लोग हुए, उन्होंने तो यही कहा। दया, करुणा, प्रेम, सेवा, समभाव, समदृष्टि। यही कहा। और जरूरतमंद की सेवा, और ईमानदारी। बस यही कहा। अगर यह नहीं पकड़े, तो फिर आप उनकी मूर्ति ले के क्या करोगे। कोई मतलब नहीं। परिणाम तो करने से आएगा। मूर्ति से परिणाम नहीं आएगा। परिणाम तो करने से आएगा। आपने क्या पढ़ा, उससे परिणाम नहीं आएगा। आपने पेपर में क्या लिखा, उससे परिणाम आएगा। आप किसकी मूर्ति ले बैठे हो, उससे परिणाम नहीं आएगा। आप कर क्या रहे हो, उससे परिणाम आएगा। आप कौन सी किताब ले बैठे हो, उससे परिणाम नहीं आएगा। आप पेपर में लिख क्या रहे हो, उससे परिणाम आएगा। जब से मिले हैं, तब से गुरु पद को जाना है, कि गुरु पद क्या है। जो ग्रंथों में हमने पढ़ा है, जैसे किसी ने लिख दिया कि ऐसे गुरु नानक देव जी गए थे, ऐसे यह हुआ, वह हुआ, तो उन्होंने ऐसे कर दिया। वह सब बातें, उनका खंडन हो रहा है। नहीं, वे अगर गुरु पद पर थे तो यह सब कुछ कर ही नहीं सकते थे। यह करते ही नहीं। यह भी पक्का है कि वे गुरु पद पर थे। यह भी पूर्ण विश्वास है कि वे पूर्ण गुरु थे। लेकिन लेखकों ने लिख दिया। जैसे लिख दिया, वैसा ही चल रहा है। वैसा ही हम सुना रहे हैं लोगों को। अब उनसे घृणा होने लगी है। यह सब बनी हुई कथाएं हैं। ऐसा उनका आचरण और आचार व्यवहार नहीं था। कुछ भी, मतलब बचपन की भी कथाएं आती हैं। काफी कथाएं उनकी मशहूर हैं, जो बार बार प्रचारक सुनाते हैं, प्रभावित करने के लिए, लोगों को जोड़ने के लिए। जैसे लिखी हैं, वैसे ग्रंथों में लिखी हुई हैं, वैसे पढ़ पढ़ कर सुनाते हैं। लेकिन अब समझ आने लगी कि गुरु पद पर जो स्थित है, उसका ऐसा आचार व्यवहार नहीं होता। वे तो बहुत करुणामय होते हैं। और वे आत्मिक कल्याण के लिए ही मार्ग बताएंगे। जन्म जन्म के दुखों से मुक्त हो जाओ। कर्म का सिद्धांत बताएंगे। गुरु पद को जिसने भी प्राप्त किया, उन्होंने कर्म का सिद्धांत ही तो बताया। कि जैसा करेगा, वैसा परिणाम मिलेगा। उन्होंने बताया कि तू कैसा कर कि तुझे परम सत्ता मिल जाए। वह परम स्थिति प्राप्त हो जाए। वह परम आनंद प्राप्त हो जाए। तो मुझे बस इतना देखना है कि मैं अगर गुरुद्वारे में हूं, तो क्या गुरुद्वारे वाला काम कर रहा हूं। गुरुद्वारा गुरु नानक जी के नाम से बना है, किसी और के नाम से नहीं। तो मुझे मेन उनको पकड़ना है। फिर उनकी वाणी को पकड़ना है। उन्होंने क्या कहा है, और क्या किया है, और क्या करने के लिए मुझे बोला है। क्या किया है उन्होंने। उन्होंने क्या कहा है, और मेरे लिए क्या कहा है, वह देखो। क्योंकि हो सकता है उन्होंने कुछ किया, और तुम्हारे लिए कुछ और कहा। क्योंकि उन्होंने उस क्षमता से किया, वहां तुम होगे ही नहीं। और यहां रह के अगर तुमने वह प्रयास किया तो तुम्हारा पतन हो जाएगा। तो यह देखना है, उन्होंने क्या किया, क्या कहा, क्या बोला है आपके लिए। तो मुझे गुरु नानक जी को पकड़ना है। मैं जहां हूं, वहां के मेन को पकड़ना है। बीच में लोग क्या करें, उनको नहीं पकड़ना है। अभी भी मौका है। एक दिन तो यह छूट ही जाएगा। उनके तीन ही उपदेश मेन उन्होंने दिए। किरत करो, नाम जपो, और वंड छको। कहने का मतलब, किरत करो। दुनिया में अगर आए हो तो कुछ न कुछ करो। कुछ न कुछ भी क्या। कुछ न कुछ में भी धर्म की किरत करो। धर्म की किरत करनी है। बेईमानी नहीं करनी है। धर्म की किरत में यह आ गया कि बेईमानी न हो। जो भी तुम्हारी किरत हो, उसमें बेईमानी न हो। तुम्हारी सच्ची सुच्ची किरत हो। उसमें बेईमानी न हो। तो नाम जपना है, परमात्मा का नाम लेना है। और जो भी तुमने प्राप्त किया है, उससे दूसरों का सहयोग करना है। बस यही तीन उन्होंने उपदेश मेन दिए थे। जरूरतमंद की सहायता करनी है, मदद करनी है। पहले तो तुम्हारी किरत में बेईमानी नहीं होनी चाहिए। फिर दूसरे नंबर पर परमात्मा के नाम से जुड़ना है, परमात्मा का नाम लेना है। तीसरे नंबर पर जो भी तुमने कमाया है जिंदगी में, उसका दसवां हिस्सा तो जरूरी है। जितना आपने कमाया है, जरूरत से। जैसे दस हजार आप ले रहे हो, महीने का कमाते हो, धर्म से, बेईमानी के अलावा, बेईमानी जिसमें नहीं है। अगर आपकी औसत दस हजार की है, तो एक हजार एक महीने में आपका वह दूसरों की मदद में जाना चाहिए। इतना करने से आप उस परम सत्ता से मिल जाओगे। तनख्वाह की बात तो बाद की है। बेईमानी नहीं छूट रही। तो फिर तनख्वाह क्या करें। उन्होंने कहा ईमानदारी। ईमानदारी हम भूल गए। उन्होंने यह नहीं कहा कि नौ हिस्सा लूटना और दसवां हिस्सा दान कर देना, इससे कल्याण होगा। नहीं। पहला स्टेप है ईमानदारी। बेईमानी का त्याग। तब दसवां हिस्सा। मेरा तो इतना ही कहना है कि अगर आप कुछ कर रहे हो, आप उसके साक्षी रहिए कि मैं जैसा कर रहा हूं, क्या वैसा होगा। अगर नहीं होगा तो मैं फिर कर क्यों रहा हूं। तो बेईमानी हो गई। मैं कम से कम अपने आप को हटा लूं। जैसा जो करेगा, वैसा परिणाम। तो मुझे यह देखना है कि मैं किसी भी महापुरुष को मानता हूं, क्या मैं उसके बताए अनुसार चल रहा हूं। यह देखना। दसवां हिस्सा तो बाद की बात है। पहले तो ईमानदारी। सर्वप्रथम पहले ईमानदारी। ईमानदारी के बाद का कमाया हुआ दसवां हिस्सा। बेईमानी का दसवां हिस्सा नहीं। कहानी आती है कि गांव का एक प्रधान था, एक गरीब था। दोनों ने भोजन लाया। प्रधान ने पूछा कि आप मेरा भोजन क्यों नहीं ग्रहण कर रहे, इसका ग्रहण कर रहे हैं। मेरे भोजन में क्या कमी है। ठाकुर, भोजन तो इससे भी अच्छा है। इसकी तो रोटी ही सूखी है। फिर कहानी कहती है कि उन्होंने रोटी ली। एक से खून और एक से दूध निकला। तो आपको लग रहा है कि आपके बेईमानी के पैसे को वे स्वीकार करेंगे। दसवां क्या, पूरा भी दे दो तो कोई मतलब नहीं। क्योंकि आपने किसी का खून चूसा है। बेईमानी का मतलब, आपने किसी को पीड़ा दी है। बेईमानी हमेशा किसी व्यक्ति को, किसी जीव को पीड़ा देती है। तो अगर पीड़ा दे के कुछ ला रहे हो, तो आपको लग रहा है कोई महान है तो ग्रहण करेगा। तो प्रार्थना करिए। किसी भी तरीके से पूरी तरह ईमानदारी अपना लीजिए। अपनी जरूरत में जीना चालू करिए। और कोई भी ऐसा काम लीजिए जिससे आपका आत्मिक कल्याण हो। अगर कोई भी काम लग रहा है बेईमानी है, तो उसे तुरंत त्याग कर दो। कोई न कोई रास्ता मिल ही जाएगा।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 9 अगस्त 2026 · 2026-08-09