प्रश्नोत्तर P3-0182 · भाग 3
(कुटिया में साधक) आज भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन रहा है, (बेईमानों को) पुरस्कार मिल रहे हैं; ईमानदारी से पुलिस की नौकरी करना बहुत तकलीफ में आ रहा है, हम शिक्षकों को भी बहुत तकलीफ हो रही है — हमें दिखाना पड़ता है कि हम ईमानदार हैं। समूह ज्यादा है, बड़े अफसर कहते हैं नीचे से ऊपर तक की व्यवस्था ऐसे ही चलनी चाहिए। ऐसे में क्या करें?
नहीं तो मत करो ना। देखो, सबके पास एक ऑप्शन है — इस्तीफा। आप दे दो। या तो जिस पद पे हो, उस पद का काम करो — उस पद का काम बताया गया है, उस पद में बेईमानी नहीं है — तो आप (बेईमानी) मत करो ना। और अगर आपको करने नहीं दिया जा रहा है, उनका समूह ज्यादा है, तो एक ऑप्शन है — इस्तीफा, कारण बता के दे दो। (वे बात) खुल के कहां बोलते हैं? अगर परिचय हो, अपना प्रेम का हो, तो आपसे बात करेंगे; खुल के थोड़ी ना बोलते हैं। जब वो लेटर पढ़ते हैं तो क्या उसमें (यह) लिखा रहता है? आपस में मिलकर बात करते हो, लेकिन समाज के सामने खुल के थोड़ी (बोलते)।
आप देखो कि आप किस पद पे हो। ज्यादा बात करने से अच्छा है — आप जिस पद पे हो, वो पद वाला काम करो, बस, बात खत्म। क्योंकि मुझे निकलना है। अगर कोई (बेईमानी) कर रहा है तो वह जाने, और जिसकी दुनिया है वह जाने। लेकिन इस दुनिया में, इन लोगों के बीच में मैंने एक फैसला किया है कि मुझे निकलना है, और निकलने के लिए ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग। और ये मुझे मिल गया, क्योंकि ईमानदारी मेरे बस में है — ऐसा नहीं कि मैं किसी पर निर्भर हूं; सत्कर्म मेरे बस में है। और यह जीवन में आ गया, तो फिर गुरु का भी महत्व है। और यह दोनों नहीं हैं, तो गुरु मिल भी जाए तो तुम खुद उसे लात मार के चले जाओगे। रामकृष्ण परमहंस को एक पंडित जी थे, पुरोहित थे — वो लात मार दिए, क्योंकि उनको गुरु का मतलब ही समझ में नहीं आ रहा था। तो कहने का मतलब है कि अगर ईमानदारी-सत्कर्म जीवन में नहीं है, तो फिर आप गुरु को भी लात मार दोगे। अर्जुन ने अपना कल्याण कर लिया; दुर्योधन ने लात मार दिया — और दुर्योधन को सामने से जाकर समझा रहे थे।
तो भैया, मैं आपसे एक ही बात कहना चाहता हूं — तुम अपनी जवाबदारी लो। ज्यादा उछल-कूद मत करो मेंढक की तरह; कुछ नहीं होने वाला है। ज्यादा टर-टर करोगे तो सांप आएगा, निगल लेगा। पूरी दुनिया बदलने के लिए ज्यादा टर-टर करोगे, तो एक समय आएगा, काल आएगा और निगल लेगा — टांय-टांय फिस्स हो जाओगे। क्योंकि ज्यादा आवाज मारोगे तो अगल-बगल में सांप भी हैं; ज्यादा लोगों को अगर तुम सुधारना चाहोगे, तो सब मिलकर तुमको ही बर्बाद कर देंगे, क्योंकि उनकी संख्या ज्यादा है। और अगर तुम उनको नहीं छेड़ोगे तो वह तुम्हें नहीं छेड़ेंगे। एक बात याद रखना — ईमानदार व्यक्ति को बेईमान नहीं छेड़ता; उससे क्या मतलब?
अपने कल्याण में लगो। बुद्धिमान व्यक्ति अपने कल्याण में लगता है, और मूर्ख व्यक्ति — खुद का कुछ नहीं हुआ, बस मुझे यह करना है, मुझे दुनिया बदलनी है, मुझे सब पाखंडी लगते हैं। तुमने क्या किया? अगर तुमसे पूछा जाए कि तुमने क्या किया, तो — बस हमने तो जीवन भर निंदा ही किया, टीका-टिप्पणी करी बस। और ये टीका-टिप्पणी करने वाले कहीं पहुंचते नहीं हैं; इनका पतन हो जाता है।
अगर आप अपने आप को पूरी तरह देखो, तो कहोगे यार, मेरा तो अस्तित्व कहीं है ही नहीं। तुम्हें (जरूरी होने का) ऐसा लगता है, क्योंकि तुमने जबरदस्ती अपने अस्तित्व को तैयार किया है। अगर तुम देखोगे तो कहोगे — यार, समाज को तो मेरी जरूरत ही नहीं है। चलो, तुम चले जाओ एक-दो साल के लिए कहीं एकांत में, तो देखो — तुम्हें यह भ्रम हो गया है; इस भ्रम को तोड़ो। समाज को तुम्हारी कोई जरूरत नहीं है; हां, समाज की तुम्हें जरूरत है — यह याद रखना। अब जरूरत क्यों है? क्योंकि समाज में ही तुमने बेईमानी किया, अब समाज में ही ईमानदारी-सत्कर्म करके निकलोगे। इस भ्रम से हट जाओ। आप जहां से हटोगे, पता कर लो — वो हंसते हुए (मिलेंगे)। वो कह रहा है कि मैं आपके लिए रो रहा हूं — ना ना, वो बस क्षणिक है। जैसे ही तुम गए, वो अपनी लाइफ का हर एंजॉय कर रहे हैं। अगर तुम्हारी याद में इतना परेशान होते तो पागल की तरह रोते ही रहते, उनके जीवन में कुछ नहीं होता। वो एंजॉय भी कर रहे हैं, घूम भी रहे हैं, खा-पी भी रहे हैं; जब मौका आता है तो कह रहे — हम तुम्हारे बिना रह भी नहीं पा रहे हैं।
मैं आपको बताऊं — मैं जैसे अपनी बहन के यहां रहा, जहां भी रहा, मैं हटा तो मैंने उन्हें हंसते हुए पाया, और अच्छे से; क्योंकि मैं था तो कुछ जगह लिया था, बाद में गया तो उस जगह पे बेड हो गया, वो लोग और अच्छे से रहने लगे। ये मुझे भ्रम है, और ये भ्रम सामने वाला दे भी देता है — जितना तुम्हें भ्रम है ना, उतना वो देता भी है कि यार, तुम्हारी याद बहुत आ रही है, हम तुम्हारे बिना रह नहीं पाएंगे। अगर आप देखो तो — तुम उससे कितना दूर हो, कितने महीने, कितने साल हो गए; उसने लाइफ का एंजॉय किया, खूब खाया, खूब पिया, खूब रहा; जब तुमसे बात हुई तो रो दिया। अगर इतनी तुम्हारी याद थी, तो वो तुम्हारी याद के अलावा कुछ करता ही नहीं, किसी से बातचीत भी नहीं करता। अगर इतना तुम्हारा वियोग है कि बर्दाश्त नहीं कर पा रहा, तो उसके जीवन में कोई काम ही नहीं होता। और आप देखो तो उसके जीवन में हर कार्य हो रहा है; लेकिन वो तुम्हारे भ्रम को मजबूत करके रखा है — तुम्हारी याद बहुत आती है, बहुत सताती है, हम तुम्हारे बिना कैसे रहेंगे; बेचैन हैं, लेकिन मस्ती खूब करते हैं। टेंशन मत लेना — एंजॉय खूब कर रहे हैं, लाइफ को बढ़िया से जीते हैं, खा-पी के जी रहे हैं, सारे काम हो रहे हैं, व्यवस्था भी चल रही है, सब चलेगी। इस बात को नोट कर लो आप लोग।
तुम एकदम अगर देखा जाए तो ज्यादा तकलीफ दे रहे हो उनको। तुम निकलो उनकी जिंदगी से, एकदम निकल के देखो — यह मेरा व्यक्तिगत जीवन का अनुभव है। तुम तो उनके लिए कांटा थे; डर के रहना पड़ता था, अनुशासन में रहना पड़ता था। वो अनुशासन में रहना नहीं चाह रहे थे, वो जंजीर तोड़ना चाह रहे थे; तुम उन्हें जंजीर से बांध के रखे थे। अनुभव लेना है तो तुम निकल कर देखो — एक साल के बाद अपने घर जाओ, सब बदला हुआ पाओगे। या कोई ईमानदार व्यक्ति लगाओ कि बस आपको वहां की जानकारी देता रहे — कहेगा, यार सब मजे से हैं; लेकिन जब तुमसे बात होगी (तो रोएंगे)। अगर कोई किसी का वियोग बर्दाश्त नहीं कर सकता, तो उसके बिना वो कोई काम नहीं करेगा, किसी से बातचीत ही नहीं करेगा, पड़ा रहेगा जिंदा लाश की तरह — तब लगता है कि हां यार, इसको मेरी जरूरत थी। और तुम सारे काम मजे से कर रहे हो और कह रहे हो कि यार, तुम्हारे बिना तो रह ही नहीं पाते।
तो मैं यही कहूंगा कि तुम अपने आप को निकाल लो। ज्यादा मेंढक की तरह उछल-कूद मत करो, नहीं तो वही काल आएगा और गप से ले लेगा; कहोगे — यार, मैं कहां आ गया; चलो, मौत आ गई, चल दो, बदल गई दुनिया। जरूरत-योग्यता में जी के अपने आप को निकालो।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 1 मार्च 2026 #योगी · 2026-03-01