प्रश्नोत्तर P3-0003 · भाग 3
गृहस्थ में काम-धंधा भी देखना होता है; आजकल किताबें-पत्रिकाएं-सोशल मीडिया में नकली-असली का भ्रम बहुत है। प्रयाग में नागा साधु पैसे मांगते देखे, आईटीन बाबा आदि — फक्कड़-दिगंबर पहचान नहीं आती। गुरु की खोज और शास्त्र कैसे चुनूं कि वैराग्य धूमिल न हो, कोई बेवकूफ न बना दे, और नब्बे साल घूमते रहकर भी न पहुंचूं जैसी हालत न हो? गृहस्थ में वैराग्य की प्रचंडता कैसे बनी रहे?
गुरु ज्ञान का प्रतीक है। पीछे संत महापुरुष हुए — रमण महर्षि, रामकृष्ण परमहंस, नरसिंह मेहता, मीराबाई, बुद्ध, महावीर, संत रविदास जी — अनेक। उनके बारे में पढ़िए, जीवन चरित्र पढ़िए। उपलब्धि के बाद मत पढ़िए; उपलब्धि के पहले पढ़िए — कैसे साधनाएं कीं, कैसे आगे बढ़े। गीता पढ़िए। फिर एक महीने भ्रमण के लिए निकलिए।
जैसे छोटे बच्चे — मां उंगली पकड़ती है, गिरते हैं, चोट लगती है, फिर धीरे-धीरे चलने-दौड़ने लगते हैं। खोज में ये सब होगा — नकली मिलेंगे, असली मिलेंगे। पहले नकली ही मिलेंगे, क्योंकि असली का सामना अभी नहीं कर पाओगे; इसलिए भी कि तुम्हें भी नकली जिंदगी चाहिए, असली के लायक अभी हो ही नहीं। जब नकली पहचान लोगे तो असली मिल जाएगा — नकली के पीछे ही असली खड़ा है। सीधा असली मिल जाए तो आपकी जिंदगी वैसी है ही नहीं; पारखी नजर अभी नहीं।
शुरुआत में अध्ययन करो, एक महीना भ्रमण करो; गुरु मिल जाए तो शरण में। गृहस्थ हो, दायित्व निभाना है तो कम से कम उसके सानिध्य में एक महीना। ठोकरे तो खानी पड़ेंगी — इतिहास देखो, बुद्ध, महावीर, मीरा, कबीर, नानक, ज्ञानेश्वर, विवेकानंद — कितने नकली का सामना; नकली छोड़ते गए तो असली मिला।
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