प्रश्नोत्तर P3-0002 · भाग 3
गृहस्थ मुखिया को दिन में वैराग्य की लहर आती है — कोलू का बैल बन गया, भागने का मन; फिर जिम्मेदारी और रोटी-छत की चिंता से लहर ठंडी पड़ जाती है। वैराग्य की गर्मी बनाए रखते हुए जिम्मेवारियां निभाते हुए अध्यात्म में रोज कदम कैसे बढ़ाएं?
मान लीजिए आपके पास मशीन बिगड़ जाए — क्या हिमालय जाकर बैठे रहोगे, बन जाएगा? नहीं। बनाने वाला चाहिए; आपको तो नहीं आता, प्रयोग में बिगड़ी। तो हमें शास्त्र पढ़ने चाहिए, महात्मा-संतों की वाणी पढ़नी चाहिए, और गुरु की खोज करनी चाहिए। गुरु कैसा होता है, वाक्य कैसे, रहन-सहन कैसे — जानकारी लो। गुरु शब्द है, ज्ञान का प्रतीक। जो मार्ग बताए, बात समझ में आए, राग-द्वेष-मोह-शक्ति-इच्छा-अपेक्षा और कर्ताभाव छूटने लगें — वो गुरु है।
कहा गया गुरु के प्रति तन-मन-धन समर्पित करो — शरीर के प्रति नहीं, शब्द के प्रति। जो ज्ञान मिल रहा है उसमें जीना शुरू करो; वही समर्पण है। शब्दों में जिओगे तो जीने का तरीका अलग होगा; शरीर का उपयोग सत्कर्म-ईमानदारी में होगा। लोग भावार्थ व्यक्ति-विशेष के शरीर को समझ लेते हैं; गुरु तत्व है — आत्म तत्व में स्थिर, उसकी अंतरात्मा से शब्द, उन शब्दों में जीना। शास्त्रों, संतों, महात्माओं की वाणी का सहारा लो और गुरु की खोज करो।
बारह महीने में एक महीना भ्रमण भी दो — कब तक? जब तक गुरु न मिल जाए। गुरु मिल जाए तो उसके सानिध्य में; गृहस्थ हो तो परिवार को ग्यारह महीना, एक महीना गुरु का — अगर अपना कल्याण चाहते हो।
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