आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P21-0124 · भाग 21

गुरु जी, आप जो बोलते हो सब सही और अच्छा लगता है, लेकिन बाहर जाते ही सब भूल जाता हूं — क्या करूं?

सुनते रहो। जैसे किसी ने एक बार नाम बताया, याद नहीं हुआ, दोबारा पूछा तो याद हो गया। ये सत्संग रिकॉर्ड हो रहा है, घर पर सुनना; चैनल पर हजारों वीडियो हैं; शास्त्र, वेद, पुराण, वेदांत का अध्ययन करना। आसपास कोई आश्रम हो, वहां जाओ और देखो मेरे लिए कहां बातें हो रही हैं — अगर आश्रम में सिर्फ भंडारा हो रहा है तो शरीर के लिए है, कोई मतलब नहीं; अगर कोई ज्ञान दे रहा है तो उसकी शरण में जाकर बैठो। वृक्ष छोटा हो या बड़ा, हमें तो छांव चाहिए — एक शरीर के लिए छाया छोटा पेड़ भी दे देगा; बड़ा-छोटा मत देखो, बाहर के आवरण से क्या मतलब, जहां जरूरत पूरी हो वहां बैठ जाओ। ज्ञान एक होता है, दो नहीं — जैसे धरती के अंदर से पूरे विश्व में पानी एक ही जगह से आ रहा है, बस स्वाद अलग-अलग हो जाता है, वैसे ही वाणी का स्वाद अलग; मुझे तो प्यास बुझानी है। रूप मत पकड़ो, इस पिंड को मत पकड़ो, ज्ञान पकड़ो, चाहे जहां से मिले। और सबने बोला है जीवंत गुरु चाहिए — विद्यालय का बहुत अच्छा शिक्षक शरीर छोड़ गया तो उसका फोटो रखकर पढ़ाई नहीं हो सकती, पढ़ाई शरीर वाला ही कराएगा; तो अपने आसपास ऐसे लोगों को पकड़ लो।

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वीडियो: मुझे कहां होना है ? कलबुर्गी कर्नाटक में पुनः सत्संग 12 जुलाई 2026 #योगी · 2026-07-14