आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P20-0144 · भाग 20

हम हर समस्या को "मेरा प्रारब्ध है, लेना-देना पूरा करना पड़ेगा" कहकर अध्यात्म में पीछे रह जाते हैं — प्रारब्ध सच में होता है?

प्रारब्ध होगा तो मुझे रोक लेगा, मैं तो आत्मिक कल्याण के लिए निकल रही हूं — ऐसा समझो। प्रारब्ध बनाने वाला कौन है? हम ही तो हैं — कर्ता भी हम, धर्ता भी हम; मैं जितना करूंगा उतना होगा, ये प्रारब्ध वगैरह छोड़ो। आपके किए गए कर्म का परिणाम ही प्रारब्ध है; आज से आपका कल है, तो आज अपनी समझ से करो, कल उसका परिणाम आएगा। जो जिम्मेदारी नहीं भी है उसे प्रारब्ध मान लेना — वह हमारा डर, स्वार्थ, रसपान और लालच है। महात्मा बुद्ध भी पत्नी-बच्चे को प्रारब्ध मानकर बैठ जाते तो निकल न पाते।

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वीडियो: ऐसा क्या करूं, जो तेरी सेवा हो पाए ? #योगीजी_का_सत्संग · 2025-09-02