प्रश्नोत्तर P17-0020 · भाग 17
सब कुछ प्रत्यक्ष है, अपनी समझ से समझ भी रही हूं, फिर भी शक पैदा कर रही हूं और अपने ऊपर शक नहीं कर रही; मुझे लगता है जैसे मैंने अपने आप को गहरी गुफा में छुपा दिया है कि आप वहां न पहुंच पाओ, और साथ ही चिल्ला रही हूं कि मेरा आत्म-कल्याण कर दो। मैं अपने आप को बचाना क्यों चाहती हूं? और ये मालिकपन का भाव जाएगा कैसे?
बचाना इसलिए चाहते हो कि बचने में तो आप हो। बचने में लगता है कि देखो अभी भी मैं मालिक हूं, मैंने अपने आप को बचा लिया — मालिकपन का भाव जा नहीं रहा है, कर्तापन का भाव जा नहीं रहा है; बचाने में लगता है कि देखो मेरी समझ इससे ज्यादा है। मालिकपन का भाव तभी जाएगा जब कर्तापन का भाव जाएगा। ये कोई मालिकपना है? ये तो भिखारी से भी घटिया हालत है — ये आपको अभी लग रहा है क्योंकि अभी आप सत्संग में हो। आप अपने आप से बोझिल हो, उस बोझिलपन में ही आप हो, और चिल्ला रहे हो कि छुड़ाओ। गुस्से में मां भी बच्चे को कह देती है "तू मर जा", लेकिन उसका भाव मरने का थोड़ी रहता है — ऐसे ही आप दुख से इतना व्याकुल हो कि कह देते हो मुझे आत्मिक कल्याण करना है, इससे निकलना है, लेकिन सही पूछो तो अभी पूरी तरह निकलना नहीं है।
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वीडियो: आखिर तेरा क्या होगा ? #योगी · 2026-01-11