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प्रश्नोत्तर P17-0019 · भाग 17

योगी जी, आप कहते हैं ईमानदारी से जिएं ताकि नए बंधन न बंधें, और सत्कर्म करें ताकि पिछले कर्मों से उभरने में मदद मिले। लेकिन सत्कर्म भी हम अपने ही दिमाग से समझ लेते हैं — चींटियों को दाना डाल दिया, दरवाजे पर कोई आया तो भोजन करा दिया। तो सत्कर्म और क्या-क्या हो सकते हैं?

सत्कर्म मतलब — जहां जरूरत है, जहां जरूरत है, वहां सहयोग करना: धन से, तन से, समझ से। ये सत्कर्म है। बिना सत्कर्म के आपका कल्याण नहीं होगा।

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वीडियो: आखिर तेरा क्या होगा ? #योगी · 2026-01-11