प्रश्नोत्तर P16-0149 · भाग 16
गुरु जी, मानव इसलिए तो नहीं बनना चाहते कि मानव में दुख और सुख दोनों आते हैं? राक्षस बनेगा तो उसे सुख ही सुख भोगने को मिलेगा?
तीन गण भी होते हैं — मानव गण, देव गण, राक्षस गण। मानव तन में आदमी पैदा होता है, और कर्म करता है तो ज्यादातर या तो देव बनना चाहता है या राक्षस; मानव बनकर कम लोग जीना चाहते हैं। और मानव बनकर जियोगे तभी परमात्मा से मिलना होगा। देव भी बनना चाहे तो भटके, राक्षस बनना चाहे तो भी भटके — पाप-पुण्य की तिजोरी लेकर तराजू में इधर से उधर घूम रहे हो। मिलना तो तभी होगा जब पूरी तरह मानव बन जाओगे; इसलिए पहले अपने आप को पूरी तरह मानव तो बनाओ, पहले परोपकार में तो लगो। दुख-सुख राक्षस को भी आते हैं, देवता को भी आते हैं — क्यों नहीं आएंगे? ये तीनों दुख-सुख वाली योनियां होंगी, लेकिन मानव वाली नहीं; मानव वाली दुख वाली नहीं है, प्रसन्नता वाली है। संसार को दुखालय बताया गया है — लेकिन कौन सा संसार? जो आपने निर्माण किया वह संसार दुखालय है। परमात्मा का बनाया संसार दुखालय नहीं है; उसमें जो गया वह प्रसन्नता से भरा रहेगा। तुम्हारे संसार में दुख है — खुद के संसार में खुद ही दुखी है; उसके संसार में कोई दुख ही नहीं है।
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