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प्रश्नोत्तर P16-0114 · भाग 16

यह भी आपसे ही सीखा है कि हर कर्म का फल मुझे भोगना है।

एकदम, भोगना ही है। आप स्वीकार नहीं करोगे तो भी भोगोगे, और स्वीकार करोगे तो भी भोगोगे। तो स्वीकार कर लेना ही ठीक है; भोगना तो आपको ही है, हर हाल में। देखो, कोई इलाज कराने जाता है — अगर स्वाभाविक करा लेता है तो ठीक है, नहीं तो बहुत लोग पकड़ के, बांध के करते हैं; करवाना तो पड़ेगा, नहीं तो सड़ जाओ। ऐसे ही कर्मों का परिणाम आपको भोगना ही पड़ेगा, पकड़ के भोगवाएंगे, भागोगे कहां? तो अपने कर्मों को भोगने के लिए तैयार हो जाओ। स्वीकार कर लो कि मैंने जितना भी किया है उसका परिणाम भोगूंगा, और अब से मैं ईमानदार रहूंगा — कोई भी स्थिति-परिस्थिति आ जाए, अब मैं बेईमानी नहीं करूंगा, चाहे मेरे साथ कोई रहे, चाहे ना रहे। जहां भी रहूंगा, मेरी ईमानदारी रहेगी, और इसका साक्षी स्वयं मैं हूं। किसी के साथ रहने के लिए, या कोई मेरे साथ रहे इसके लिए, मैं झूठ का उपयोग नहीं करूंगा, बेईमानी नहीं करूंगा। कोई साथ रहता है तो ठीक, नहीं रहता है तो ठीक। जिंदा या मुर्दा, एक दिन तो साथ छोड़ना ही पड़ेगा। तो मैं ईमानदार बनके मिलूं और ईमानदार बनके छूटूं — सामने वाला क्या कर रहा है उससे मुझे मतलब नहीं। क्योंकि संयोग है तो वियोग है; संयोग में भी ईमानदारी और वियोग में भी ईमानदारी, तब आप मुक्त हो गए। लेकिन संयोग में बेईमानी और वियोग में बेईमानी, तो फिर आप आगे लोगों से मिलने की तैयारी कर रहे हो। पीछे का जो किया, अपना भोग लेंगे; किसी को बताने की भी जरूरत नहीं — लेकिन मैं कह सकूं कि आज से मैं ईमानदार व्यक्ति हूं, बात खत्म।

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वीडियो: ईमानदार तो सिर्फ ईमानदार #योगी · 2026-02-28