प्रश्नोत्तर P16-0101 · भाग 16
(साधिका ने महात्मा बुद्ध के उस भिक्षु की कहानी सुनाई जो गाली, थप्पड़, डंडे, यहां तक कि मृत्यु सहने को भी तैयार था, ताकि ज्ञान फैला सके।) अगर हम उसकी जगह होते तो मैं भी यही करती, क्योंकि मैं खुद आई हूं, किसी ने बुलाया नहीं। फिर निवेदिता अपमान से क्यों टूट गई?
अब यहां पे देखिए — आपने भिक्षु की कहानी सुनाई, इन्होंने निवेदिता की कहानी सुनाई। एक उपलब्ध हो चुका था और एक उपलब्ध नहीं था। एक की उपलब्धि हो गई थी, तो उपलब्धि के बाद तो ये भाव आ ही जाएगा। समाज सुधारक जो होते हैं वो उपलब्धि को प्राप्त नहीं होते; वो समाज सुधार के लिए काम करते हैं, आत्मिक कल्याण के लिए नहीं। वो भिक्षु आत्मिक कल्याण की स्थिति में पहुंच चुका था, उसमें क्षमता आ गई थी। तो क्षमता आने के बाद इस भाव को व्यक्त करना कोई जटिल नहीं है, क्योंकि वो उस स्थिति में आ ही गया। और निवेदिता तो वहां आई ही नहीं थी, वो तो अज्ञानता में जकड़ी हुई थी। इस स्थिति में भी उन्होंने अपने पे संयम रखा और भागी नहीं — परीक्षा में पास हुई। भिक्षु तो परीक्षा में पास ही हो जाएंगे, क्योंकि उपलब्धि के बाद की बात थी। समझिएगा इस बात को — अज्ञानता में अपने आप को स्थिर रखना इतना आसान नहीं है। तो मैं यही कह रहा हूं कि उपलब्धि के पहले संयम और धैर्य बनाए रखना इतना आसान नहीं है।
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वीडियो: तेरी परीक्षा ही तेरा उद्धार करेगी । #योगी · 2025-10-18