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प्रश्नोत्तर P16-0100 · भाग 16

योगी जी, प्रोफेसर साहब ने विवेकानंद जी और निवेदिता की कहानी सुनाई — वह सब कुछ छोड़कर आई, अपमान सहा, फिर भी टिकी रही और आखिर में विवेकानंद जी ने अपना पूरा ज्ञान उसे दे दिया। जैसे गोयल साहब 82 साल की उम्र में सब कुछ छोड़कर आपके सानिध्य में आए हैं। तो क्या ये चीजें आखिरी क्षणों में हमारी पात्रता पर निर्भर करती हैं या गुरु की कृपा पर?

इस कहानी का पहले सार समझिए। वो सब कुछ छोड़ के किस उद्देश्य से आई थी — अपना आत्मिक कल्याण करने या समाज के लिए कुछ करने? फिर स्वामी विवेकानंद ने उन्हें किसी काम में लगाया। अब उस काम में कोई उम्मीद रख ली कि काम तो मैं कर रही हूं लेकिन मुझे इज्जत भी चाहिए, सम्मान भी चाहिए। वो उन्हें नहीं मिला और वो अशांत हो गई। एक तो वहां से अशांत, फिर स्वामी विवेकानंद ने झापड़ मारा और बोले भाग जाओ। लेकिन इतने अपमान के बाद भी वो टिकी रहीं, वहीं रहीं। इसका मतलब उनकी योग्यता हो गई, और उन्होंने उन्हें उस स्थिति में ला दिया कि अब समाज के लिए तुम काम कर सकती हो — क्योंकि समाज में बड़ा दुत्कार है। जैसे मेरे साथ नहीं हो रहा? इतना काम करने के बाद भी कितना सुनना पड़ रहा है, ये तो आप प्रत्यक्ष देख पा रहे हो। इतना अपमान सहने के बाद भी मैं काम कर रहा हूं, क्योंकि मुझे कोई उम्मीद नहीं है — सम्मान का, नाम का, शोहरत का, पैसे का कोई उम्मीद नहीं है। तो उन्होंने पहले उनकी पूरी परीक्षा ली कि तुम सब कुछ छोड़ चुकी हो, क्या तुम सच में आई हो? सच में आई थी, इसलिए तो वापस नहीं गई। जब वो पूरी तरह परीक्षा में पास हो गई, फिर उनको दे दिया और वो फैला दीं। और स्वामी विवेकानंद परीक्षा में पास हो गए तो रामकृष्ण परमहंस ने उन्हें सब दे दिया। तो गुरु तो इंतजार कर रहा है कि कोई ऐसा पात्र आए जिसमें मैं भर दूं। ऐसी पात्रता है तो गुरु भर ही देगा। गुरु तो लेके इंतजार में बैठा है, उसके काम का है ही नहीं। उसको तो जहां पहुंचना था पहुंच गया, उसे अब कुछ नहीं चाहिए। उसके पास जितना है, वह एक योग्य व्यक्ति का इंतजार कर रहा है कि कोई आए और मैं उसे दे दूं, वह समाज में बांटे। तो दिया तो उनकी योग्यता के ऊपर दिया, उनकी पात्रता के ऊपर दिया।

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वीडियो: तेरी परीक्षा ही तेरा उद्धार करेगी । #योगी · 2025-10-18