प्रश्नोत्तर P15-0116 · भाग 15
गुरुदेव, देखा गया है कि बालक में भी, जिसको अभी उतना बोध नहीं है, क्रोध-लालच दिखते हैं; पशुओं में भी। कई बालक बांटने को तैयार होते हैं, कई नहीं होते। यह कहां से आता है?
लालच तो पेट की बात है — जो उसका पेट भरता है, जो उसकी इच्छा पूरी करेगा। संचय का तो उसने अभी सीखा ही नहीं। और जो बांटने को तैयार नहीं होते, तो ये वो अपने संस्कार लेके आए हैं ना — पूर्व जन्म के संस्कार। तभी तो कोई राजा के यहां, कोई रंक के यहां; कोई स्वस्थ पैदा होता है, कोई कुरूप, कोई सुंदर। तरीका लेके आता है, और साथ में धन, तन और ज्ञान समझने की बुद्धि-क्षमता लेके आता है अपने कर्म से। इसलिए सबका स्वभाव अलग-अलग बन जाता है। सबको एक ही तरह से ज्ञान दिया जाता है, लेकिन सब अपने-अपने तरीके से ग्रहण करते हैं, क्योंकि सबकी बुद्धि का स्तर अलग-अलग है, क्षमता अलग-अलग है। इस समाज में तीन प्रवृत्ति वाले हैं — सात्विक, तामसी, राजसी — तो जिस प्रवृत्ति का वो है, वो उसमें चला जाता है; जैसा-तैसे को खोज लेगा। यह संसार कल्पवृक्ष की तरह है: जैसे ही आप भाव बनाए और उस पर काम करने लगे, आपको वैसे लोग मिलने लगे। तो मूल आपके कर्म से आपके संस्कार हैं। जो करते हो, वह बनते जाते हो। इसीलिए कहा गया कि मूल कर्म पर ध्यान दो — क्या करते हो और किस भाव से करते हो। कर्म के पहले, कर्म के बाद एक भाव बनता है, उससे फल का निर्णय होता है। तरीका क्या है, भाव क्या है — यह जांचते हुए आप काम करो। किसी व्यक्ति के समझ में आ जाए कि मैं गलत कर रहा हूं तो अपने आप को सुधार सकता है; सुधारने वाले उसे अनेक लोग मिल जाएंगे, जैसे बिगाड़ने वाले मिले। जिसको भी बदलना है, उसको खुद काम करना पड़ेगा; मदद करने वाले लोग मिल जाएंगे।
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वीडियो: हमारी स्मृतियां कब संस्कार बनती हैं ?#प्रत्यक्षज्ञान #yogijikasatsang #साधना #आध्यात्म · 2026-08-11