प्रश्नोत्तर P12-0147 · भाग 12
आज के समाज में बहुत से सिद्ध साधु-संत अपने शिष्यों को आशीर्वाद देते हैं कि आपकी मनोकामनाएं और जरूरतें पूरी हों — तो क्या वो पूरी होती हैं? क्या उनके आशीर्वाद से वास्तव में साधक का कल्याण होता है?
अगर किसी के आशीर्वाद से कुछ हो जाता, तो कोई सीधा राजा बनने का आशीर्वाद दे देता — उससे नीचे क्यों बोलना? मान लीजिए कोई आपके पास आया, प्रणाम किया, आपको भूख लगी थी या प्यास, उसने आपकी सेवा की, तो जाते समय आपके अंदर से उसके लिए आशीर्वाद निकलेगा — कितना भी श्राप देना चाहो, नहीं निकलेगा; उसके कर्म की वजह से उसे आशीर्वाद मिला। और कोई बेमतलब धक्का मार दे, आपका कोई दोष नहीं था, तो कितना भी आशीर्वाद दो, श्राप ही निकलेगा। कोई ना किसी को आशीर्वाद दे सकता है, ना श्राप — जैसा आपका कर्म है, वैसा आपको आशीर्वाद या श्राप मिलता है। परोपकार करोगे तो रोम-रोम से आशीर्वाद, सेवा करोगे तो मुंह से आशीर्वाद, किसी को सताओगे तो रोम-रोम से श्राप। आपकी योग्यता के अनुसार मिलता है; मूल आपका कर्म है, और किस भाव से कौन सा कर्म कर रहे हो। कर्म के पहले और कर्म के बाद एक भाव बनता है, भाव से फल का निर्णय होता है, ना कि कर्म से — क्योंकि बुरे कर्म भी हम अच्छा दिखाकर कर देते हैं। घर में मेहमान आए, परिवार के दबाव में सेवा कर रहे हो पर चाहते नहीं कि वो रुके, तो भाव से आप बुरा बांध रहे हो; सीधी बात हां या ना में करनी चाहिए। आजकल सेवा के नाम से लोग मेवा खाने लगे हैं — दूसरों के लिए व्यवस्था मांगकर खुद उपयोग करते हैं, तो इतनों का श्राप एक आदमी कैसे झेलेगा? साधना कर रहे हो और भोजन, रहने की व्यवस्था मिल रही है, तो वह साधना करिए, नहीं तो उसका भी दोष लगेगा। कंपनी में पैसा ले रहे हो तो इतनी ईमानदारी से काम करो कि लगे मैं अपने काम का पैसा ले रहा हूं — मालिक देखे या ना देखे, स्वयं तो देख रहे हो; काम नहीं किया तो बोल दो कि इतना पैसा मुझे नहीं चाहिए। ऐसा करोगे तो भाव की शुद्धि होगी, निर्विकार होने में सहायता मिलेगी। आशीर्वाद या श्राप किसी जीव के द्वारा ही मिलता है, क्योंकि पाप-पुण्य, परोपकार अकेले नहीं हो सकते — कर्म और बंधन भी दो में होते हैं, और जिस रस्सी से गांठ लगी वही खोलने में काम आएगी; तो ज्ञान की तलवार से अपने सारे बंधनों को काटो। जो मेरे साथ हो रहा है उसका जिम्मेदार स्वयं मैं हूं। प्रकृति कई गुना लौटाती है — सेवा और पाप अन्न की तरह हैं, कई गुना मिलते हैं; परोपकार फल के पेड़ की तरह है, कई सालों तक देता है। जरूरतमंद की सेवा करो, पर पूछ लो कि इसका उपयोग क्या करोगे — जो शराब के लिए मांगे उसे मत दो, शक हो तो भोजन लाकर दे दो। यहां पाप-पुण्य का माइनस-प्लस नहीं होता, जो किया उसका परिणाम भोगना ही पड़ेगा; जो बचाने का आश्वासन दे रहे हैं, जिनके सहारे दे रहे हैं, वो खुद भोगकर गए। मजबूत आदमी को धक्का मारा तो तुरंत हिसाब, पर कमजोर को सताया और वो दबाव में बोल नहीं पाया, तो प्रकृति देगी और कई गुना देगी। परोपकार में इच्छा-अपेक्षा नहीं होती — कोई मोल भी दे तो कहते हो, भाई मैं बिकाऊ नहीं हूं।
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वीडियो: क्या किसी के आशीर्वाद से कुछ होता है ? #योगी · 2026-07-03