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प्रश्नोत्तर P12-0137 · भाग 12

हम चाह रहे हैं कि हमारी यात्रा सुपरफास्ट हो जाए, हम और तेज जाना चाहते हैं — तो उसके लायक कैसे बनें?

आप चाह रहे हो, तो जब उस लायक हो जाओगे तो दे दिया जाएगा; जरूरी नहीं कि आप चाह रहे हो तो उस लायक हो। एक छोटा बालक बोलता है मुझे बाइक चलानी है, परिवार समझता है वो नहीं चला सकता, फिर भी वो चोरी से चला लेता है और गिरकर हाथ-पैर तोड़ लेता है। जब हम कुछ मांग कर रहे हैं, तो मांग करने से पहले देख लो हम लायक हैं कि नहीं — कि और तेजी से सत्कर्म, और तेजी से काम कर सकते हैं। हम तो डिमांड ही कर रहे हैं कि मिल जाए तो कर देंगे। जितना मिला है, उसको आप किस चाल से, कितनी तेजी से, कितने भाव से करते हो — वही देखकर प्रकृति आगे तेज देगी। अगर करने के बाद पछता रहे हो, थक गए, तो आगे उतना तेज नहीं मिलेगा। आप किसी को काम दो और वो कहे मैं थक गया, तो आप आगे का काम रोक दोगे; और कहे नहीं, थकान कुछ नहीं लगी, बढ़िया से करके आया, तो सोचोगे इसे और आगे का काम दिया जाए। ऐसी ही प्रकृति है — वो देखती है कि कार्य करने के बाद आपका भाव क्या है, आप ऊब तो नहीं रहे, मजबूरी या लाचारी में तो नहीं कर रहे; इस हिसाब से करोगे तो वो छीन लेती है, क्योंकि हर कार्य करने वालों की लाइन है। काम मैंने ही मांगा था कि मुझे और तेजी से यात्रा करनी है, तो इसका मतलब काम बढ़ जाएगा, थकान भी होगी, तकलीफें भी होंगी, शरीर को बहुत कष्ट होगा। अब देखना है कि आप शरीर का कष्ट देखते हो या काम देखते हो। जितना काम मिला है, उसमें भाव क्या है — उसी भाव से आगे आपको दिया जाएगा। ये आपको खुद को जांचना है।

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वीडियो: समझ में कुछ आ नहीं रहा है #योगी · 2026-09-13