प्रश्नोत्तर P12-0136 · भाग 12
कभी-कभी इतना तगड़ा वैराग्य आता है, इतनी बेचैनी होती है कि खुद पर शक हो जाता है — पता नहीं हम निकलने के लिए काम कर भी रहे हैं या बस ऐसे ही जिंदगी गुजर रही है; कुछ होगा कि नहीं होगा। फिर लगता है क्या ऐसा कर दूं कि बहुत फास्ट हो जाए, पता नहीं कल जिंदगी हाथ में है कि नहीं। ये कैसे लक्षण हैं?
यहां समझना पड़ेगा कि यहां कुछ भी स्थिर नहीं है, मेरे द्वारा कुछ ना कुछ तो हो ही रहा है। बस मुझे यह देखना है कि कोई ऐसा काम तो नहीं हो रहा कि मैं और फंस जाऊं — मेरे द्वारा बेईमानी, कुछ दुरुपयोग तो नहीं हो रहा, मैं किसी को तकलीफ या दबाव तो नहीं दे रही। मुझे यह चेक नहीं करना कि मेरे द्वारा मुक्ति वाला कार्य हो रहा है कि नहीं; मुझे यह चेक करना है कि कहीं मेरे द्वारा गलत तो नहीं हो रहा, क्योंकि बेईमानी में हम माहिर हैं। जब हम ईमानदारी और सत्कर्म अपनाते हैं, तो करते-करते लगता है कुछ हो नहीं रहा, क्योंकि वहां मैं खड़ा नहीं होता, कोई आकर वाहवाही नहीं करता, किसी पर एहसान नहीं जता सकते। मेरे अहंकार को पोषण नहीं मिल रहा — जब से समझने लायक हुए, जब भी किया, लोगों ने वाहवाही की, वो अब नहीं मिल रही। लेकिन हर वक्त, हर क्षण कुछ ना कुछ होता ही रहता है, चाहे शारीरिक, चाहे मानसिक। मुझे बस इतना देखना है कि मेरे द्वारा कोई ऐसा कार्य तो नहीं हो रहा जिससे समाज को नुकसान पहुंचे, और मैं ऐसे लोगों के साथ तो नहीं हूं। क्योंकि संगत में जितना मिलेगा, उसका बंटवारा होता है — जिसकी संगत की है, उसके द्वारा क्या काम हो रहा है, उसका परिणाम मुझे भी मिलेगा। अगर उसके द्वारा समाज-हित का कार्य हो रहा है तो आपका स्तर उठ रहा है, और समाज को तकलीफ वाला कार्य हो रहा है तो उसका भी परिणाम मिलेगा, क्योंकि मैं भी कहीं ना कहीं निमित्त हूं। तो सोते-जागते, उठते-बैठते बस इतना देखना है कि मेरे द्वारा या मैं जिसके साथ हूं उसके द्वारा समाज का नुकसान ना हो, और जब भी कर्म हो तो समाज के हित के लिए करना।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: समझ में कुछ आ नहीं रहा है #योगी · 2026-09-13