प्रश्नोत्तर P1-0171 · भाग 1
गुरु जी ने बताया था कि लोग आवरण देखकर आपसे जुड़ना चाहते हैं; कोई यह नहीं सोचता कि असल में व्यक्ति कौन है और क्या सोचता है। आप ‘ठीक’ शब्द के प्रयोग की बात करते हैं — उसके पीछे क्या सोच है? और (समय आदि का) अनुमान लगाना कहां तक ठीक है?
‘ठीक’ शब्द का प्रयोग तब करना चाहिए जब हम लेन-देन कर रहे हैं। जैसे कोई मुझे भोजन करा रहा है — कैसा बना? ठीक। ‘ठीक’ न अच्छा होता है, न बुरा। अगर आप अच्छा कहेंगे तो उसका राग बढ़ेगा, और उसका बढ़ेगा तो आपका भी बढ़ेगा। बुरा कहेंगे तो द्वेष बढ़ेगा — उसने घंटों मेहनत की और आप कुछ मिनट में खाकर बोलोगे बुरा बना; बुरा बना भी हो, तो भी उसे तकलीफ होगी। ‘ठीक’ में न राग होता है, न द्वेष; कोई प्रतिक्रिया ही नहीं उठती — न तुम्हारी, न उसकी। तो ‘ठीक’ में तुम फंसोगे नहीं। इसे बहुत गहराई से समझना — प्रत्यक्ष ज्ञान का मूल सार यही है।
‘मैं’ से मैंने ‘मेरा’ बनाया — पहले जरूरत में बनाया। ‘मेरा’ में एक मेरे शरीर की ताकत, एक वैभव की ताकत, एक समझ की ताकत; फिर जिन लोगों को मैंने ‘मेरा’ बनाया, उनके शरीर, समझ और वैभव की ताकत मेरी ताकत हो गई। जब मैंने जरूरत में ‘मेरा’ बनाया, तो कोई अहम भाव नहीं था। फिर उसे मान, सम्मान, नाम, शोहरत, पैसे के लिए यूज करने लगा। झुंड की ताकत मिली, तो परम सत्य दब गया और मैंने अहम धारण कर लिया। अब अहम इतना खड़ा हो गया कि मैं खुद उससे ग्रसित हूं, परेशान हूं — मजबूत होते हुए भी निर्बल हो गया। क्योंकि जिनको मैं यूज कर रहा हूं, उनके लिए यूज भी होना पड़ेगा, नहीं तो वे मुझे नोच लेंगे। वे अनेक हो गए, मैं एक। पहले मजा आया कि इतने लोग मेरे लिए यूज हो रहे हैं; यह समझ नहीं आया कि वे इसलिए यूज हो रहे हैं कि जितना यूज हो रहे हैं, उससे ज्यादा तुम्हें यूज करेंगे। अब 100 लोग एक साथ तुम्हें नोचेंगे — बलि का बकरा।
तो ‘मैं’ से ‘मेरा’, ‘मेरा’ से अहंकार — सुख-स्वाद के चक्कर में। अब लेन-देन में अच्छा नहीं भी है तो अच्छा बोलना पड़ता है; विरोधी बुरा नहीं है तो भी बुरा कहना पड़ता है। पब्लिक में काम करने वाला जिसके साथ खड़ा भी नहीं हो सकता, उससे गले मिलना पड़ता है; अथाह घुटन होती है, पर कह नहीं सकता, मुस्कुराकर टाल देता है, क्योंकि कह दे तो सब खत्म। धीरे-धीरे लोगों के प्रभाव में, नाम-शोहरत-पैसे के लिए हमने इतनी तकलीफ इकट्ठी कर ली कि जिंदगी नरक लगने लगी है, पर किसी से कह नहीं सकते।
फंसने की दो ही स्थितियां हैं, ध्यान रखना — एक लेन-देन में (अच्छा-बुरा), और एक जब मैं काम करता हूं। काम मिला, परिणाम अभी आया नहीं, पर मैं ठोक देता हूं, स्टैंप मार देता हूं कि इतने बजे तक करके दे ही दूंगा। हो गया तो अहंकार खड़ा — देखो मैंने बोला था ना। नहीं हुआ तो सिर नीचा, और मैं सफाई दूंगा, जिम्मेदारी नहीं लूंगा — लाइट चली गई थी, पेन की स्याही खत्म हो गई, साधन खराब हो गया, ट्रैफिक लग गया। तो जब भी कोई काम करो, संभावना व्यक्त करो कि लगभग इतने बजे तक कर दूंगा, पक्का नहीं। कोई पक्का पूछे तो कह दो — पक्का नहीं है, क्योंकि इतने समय तक मैं जीवित रहूंगा या नहीं, यह भी मुझे नहीं मालूम। कभी समय का स्टैंप मत मारो; हो सकता है उससे पहले ही कर दूं। कहो कि मैं पूरी कोशिश करूंगा; अगर पूरा सिस्टम सही रहा तो मैं इतने समय में कर देता हूं। सिस्टम मेरे हाथ में नहीं है — न इस शरीर का सिस्टम, न जिन साधनों से काम करूंगा उनका।
जब आप अनुमान लगाते हो, तो कर्ता का भाव प्रकट होता है — मैंने किया। और जब काम नहीं हो पाता, तो सफाई देते हो, किसी को मोहरा बनाते हो कि मैं तो कर देता, पर इसने नहीं किया। जैसे ही आपने किसी काम को समय में बांधा, या पक्का कहा कि परिणाम यही आएगा, आप वहीं फंस जाते हो। यह ‘मैं’ का चक्कर है — तुम अपने आप को सिद्ध करना चाहते हो कि मैं कुछ हूं, और इसका मतलब है कि अंदर से बहुत कमजोर हो, इसलिए इस काम के सहारे अपने आप को सिद्ध करना चाहते हो।
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वीडियो: मेरा कर्ता भाव से कैसे मुक्त हो ? · 2026-10-11