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प्रश्नोत्तर P1-0170 · भाग 1

यह देश पहले अंग्रेजों का गुलाम रहा; वह दासता मुझमें इतनी है कि घर में भी सोचता रहता हूं कि सामने वाला क्या सोच रहा है। पति-पत्नी आपस में सोचते हैं कि यह मेरे बारे में क्या सोच रही थी, मेरा फोन तो नहीं देख लिया, नोटिफिकेशन तो नहीं पढ़ लिया। मैं इतना संकीर्ण हो गया हूं कि अपनी जिंदगी खुलकर भी नहीं जी पा रहा।

खुलकर इसलिए नहीं जी पा रहे कि कहीं न कहीं आप कमजोर हो, आपकी अधीनता है। नहीं तो खुलकर कह दो — भैया, मैं तो ऐसा ही हूं, ऐसे ही जीना चाहता हूं। लेकिन आप इसलिए नहीं बता पा रहे कि आप वह भी करना चाह रहे हो; उनके बिना भी नहीं चलेगा, इसके बिना भी नहीं चलेगा। टूट-टूटकर जिंदगी जी रहे हो — 5 ग्राम इधर से, 5 ग्राम उधर से। इसलिए आप अपने आप में पूरे नहीं हो। जितनी मेरी जरूरत है, उतने में जियूं — पहले एक बार उतना कर लूं। आप देखो कि फाइनली सच में मुझे क्या चाहिए, और जो चाहिए उसके लिए लगातार काम करो। कुछ भी चाहिए तो काम तो करना पड़ेगा। पहले पता करना पड़ेगा कि मुझे जाना कहां है, फिर यात्रा करनी पड़ेगी। ऐसे कैसे हो सकता है कि जाना कहां है यह बाद में पता करेंगे? पर ऐसा ही तो हो रहा है — कभी इसमें लिप्त, कभी उसमें लिप्त, ऑप्शन में जिए चले जा रहे हैं। मेरे पास पते इकट्ठे हो रहे हैं, और पतों का अंत नहीं है, क्योंकि जिस घर का पता ले रहे हो, कुछ साल बाद मालिक बदल जाता है, नक्शा बदल जाता है। जिस इंसान के पास रहना चाह रहे हैं, वह दूर से जितना अच्छा लगता है, पास रहो तो लगता है कि इसने जिंदगी नरक कर दी। शहर से लोग गांव जाते हैं — वाह, वाह! एक हफ्ते बाद — चलो यहां से, घुटन हो रही है। दादी दिख जाती है — कितनी प्यारी है! दो दिन रहो तो बस। अमीर आदमी कभी झोपड़ी में, गांव में जाता है तो कैसी बातें करता है, लेकिन जब वहां रहना पड़े — चार दिन की चांदनी, फिर अंधेरी रात। उसी में हमारी जिंदगी है, हर रिश्ते में भी यही है। कहीं न कहीं हम अपने आप को बहला-फुसला रहे हैं। हमारे पास पते खूब हैं, पर मुझे कहां जाना है यह नहीं पता। बस यह पता लगा लो कि मुझे जाना कहां है — बात खत्म हो जाएगी और तुम वहां पहुंच जाओगे। तुम्हारे अंदर वह क्षमता है।

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वीडियो: देखना है मुझे क्या चाहिए ? #योगी · 2026-10-12