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प्रश्नोत्तर P8-0027 · भाग 8

क्या कबीर दास जी पूर्व परमात्मा हैं? लोग कहते हैं वो परमात्मा थे, वो संत हुए। इस पर क्या कहना है?

देखो, उन्होंने खुद कहा। देखो, उन्होंने खुद कहा कि मैं राम का दास हूं। उन्होंने खुद गुरु के पास जाकर, गुरु के सानिध्य में रहकर अपना कल्याण किया। लोगों को कल्याण का मार्ग बताया। अब लोग उन्हें परमात्मा बना दे रहे हैं। बात अलग है। उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा। वह तो संत की तरह जीवन जिए और लोगों की सेवा में लगे रहे। तो सीधा कबीर की सुनिए। कबीर वालों की मत सुनो। अब देखिए। राम का एक भक्त अपने को भक्त बता रहा है और कह रहा है कि आओ, तुम्हें सौभाग्यवती का वरदान दे रहा हूं, आशीर्वाद दे रहा हूं। किसी को कह रहा है, मैं तुम्हारा कल्याण कर दूं। और राम की खुद तीन माताएं विधवा हो गईं। उन्होंने अपने पिता को बचा पाए क्या? कृष्ण का कोई भक्त कह रहा है कि आओ, हम तुम्हें कृष्ण के नाम से आयु दे देंगे। और वो अपने भांजे अभिमन्यु को खुद नहीं बचा पाए। इस प्रकृति में कोई भी आया है तो अपने कर्म का भोग कर ही जाएगा। बस लोगों ने उद्धार का मार्ग बताया, वह तुम कर लो। तो राम अगर बचाते तो अपने पिता को बचा लेते ना। पुत्र के वियोग में तड़प-तड़प के मरे। एक साधारण श्रवणकुमार के पिता का श्राप नहीं हटा पाए राम। हटाए क्या? वो कोई योगी थे? कोई ऐसे तो थे नहीं। साधारण थे। बोले, जैसे मेरा पुत्र मरा है वैसे तू भी तड़प-तड़प के पुत्र के वियोग में मरेगा, जैसे मैं मर रहा हूं। और वो प्राण छोड़ दिए। पुत्र के वियोग में तड़प के वो खुद मर गए। श्रवण मर गए। तो आप जरा समझो कि अगर कोई कबीर को परमात्मा बता रहा है तो कबीर ने क्या कहा है, वो पकड़ो ना। कबीर वालों को मत पकड़ो। इसलिए कि लोगों ने क्या किया? महात्माओं के नाम से, राम के नाम से, कृष्ण के नाम से, बुद्ध के नाम से लोगों ने व्यापार कर लिया। अब तुम फसोगे पूरी तरह तब, जब वो बता देगा, नहीं यही पूरी परमात्मा है और हम तुम्हें इनसे मिला देंगे। जरा समझो इस बात को। कबीर जी की क्या जिज्ञासा थी। गुरु से मिलने नहीं दिया गया, और वह जाकर सीढ़ी पर सो गए। और उनका पैर पड़ा, तो बोले, उन्होंने कहा राम-राम। अरे, बोले मुझे मंत्र मिल गया। तो सोचो क्या जिज्ञासा थी। कबीर ने समभाव, समदृष्टि बताया, कि समानता में जियो। किसी को बुरा-भला मत कहो। बस सत्कर्म करो। जरूरतमंद की सेवा करो। अब कबीर का भी लोग मूर्ति बनाकर पूजने लगे हैं, आरती करने लगे, कबीरपंथी में आरती करने लगे, कबीर को पूजने लगे। तो मैं यह कह रहा हूं कि वाले क्या कह रहे हैं, वो छोड़ दो। उन्होंने क्या कहा है, वो पकड़ो। क्योंकि लोगों ने क्या किया? इनके नाम से इनके प्रचारक हो गए और इनके नाम से व्यापार करने लगे। तो व्यापार करने वाला हमेशा सामने वाले को, जिसके द्वारा व्यापार कर रहा है, उसे सब कुछ बता देगा। बुद्ध वाला कहेगा बुद्ध सब कुछ है। कबीर वाला कहेगा कबीर सब कुछ है। राम वाला कहेगा राम सब कुछ है। कृष्ण वाला कहेगा कृष्ण सब कुछ है। लेकिन आप देखो तो राम ने भी जाकर ज्योतिर्लिंग की स्थापना की, रामेश्वरम में। कृष्ण भी गुरु के सानिध्य में गए, अपने आत्मिक कल्याण के लिए। गए कि नहीं गए? जरूरत थी तभी तो गए। राम भी गए, बुद्ध भी गए, कबीर भी गए। तब जरा सोचना चाहिए। तो आप भी। मेरा यही कहना है कि किसी जीवंत गुरु के सानिध्य में जाओ भाई। वाले क्या कहते हैं, उसे छोड़ दो। उन्होंने क्या कहा है, उसे पकड़ो। मैं ट्रेन में जा रहा था। तो एक ईसाई धर्म को मानने वाला था। उसने कहा कि जीसस तो परमेश्वर है। बोला, जीसस को मानते हो? बोले हां। क्योंकि अगर जीसस को जरा सा भी मानते हो ना, तो जीसस ने खुद कहा कि मैं परमेश्वर का पुत्र हूं। और तुम उन्हें परमात्मा घोषित कर दे रहे हो। यही है धंधा करने वाले, व्यापार करने वाले। ऐसा ही करते हैं। और आप देखो कि वो खुद गुरु के सानिध्य में गए, और उन्होंने कर्म के सिद्धांत को समझाया है कि भैया, जैसा करोगे वैसा पाओगे। जैसा करोगे वैसा बन जाओगे। तो वाले क्या कहते हैं, छोड़ दो। उन्होंने मुख्य क्या कहा है? कबीर ने क्या कहा है? गुरु नानक जी ने क्या कहा है? बुद्ध ने क्या कहा है? महावीर ने क्या कहा है? कृष्ण ने क्या कहा है? राम ने क्या कहा है? वो पकड़ो। उनके बारे में लोग क्या बोल रहे हैं, वो मत पकड़ो। क्योंकि वह अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए कुछ भी बोल देंगे। उन्हें अपना व्यापार खड़ा करना है। इसे हमें समझना है ना। हमें समझना है कि हमें उनकी सुनना है, सीधा, कि हमें वालों की सुनना है।

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