प्रश्नोत्तर P5-0149 · भाग 5
बुरी आदत (जैसे गुटका) छोड़नी है लेकिन छोड़ नहीं पा रहे — क्या करें?
मलाई मैं खा रहा हूं और दोष मन को दे रहा हूं। सब कुछ चलाना सीख रहे हो, लेकिन अपने को चलाना सीख नहीं पा रहे हो। वह कर रहे हो जिसकी अपने बच्चों से उम्मीद नहीं करते। जैसे आप गुटका खाते हो, लेकिन क्या आप चाहोगे कि आपके बच्चे खाएं? बताइए, आप क्यों खाते हो? नहीं खाना चाहिए, तो अब छोड़ दो।
अभी विचार तुमने बनाया। अगर आपने वहां विचार बनाया, तो आपको कोई सलाह देने वाला मिल गया। मतलब वह सलाह देने वाला शरीर है, शरीर में कोई और दिलवा रहा है। मेरी बात समझना, क्योंकि मैं आपका नाम नहीं जानता, आप भी मेरा नाम नहीं जानते। आप गाड़ी खाली करने, सामान लेकर आए हो और चले जाओगे, और आपने गाड़ी के पास विचार बनाया। तो एक काम करो, गुटका जेब में है तो फेंक दो। लेकिन फेंकना तो हमेशा के लिए। थूकना तो चाटना मत, चाटना है तो थूकना मत। लेकिन फेंकना ऐसे नहीं, आवेश में, जज्बात में नहीं; पहले सोच-समझ लो कि क्या हमेशा के लिए छोड़ोगे। थूक चाटना है तो थूकने की क्या जरूरत, क्योंकि आत्मिक गिर जाओगे ना। और आपने विचार बनाया और आपको कोई बोल रहा है, तो समझ लो कि वही बुलवा रहा है, क्योंकि मेरी प्लानिंग नहीं थी कि मैं आपको गुटके के लिए बोलूं। आपने विचार बनाया और तुरंत आपको कोई सलाह देने वाला मिल गया, इसका मतलब वह दिलवा रहा है। तो उसकी बात मान लो, फिर खत्म करो, जाओ फेंक दो हमेशा के लिए।
क्या बुद्धि इतनी गिरी है तुम्हारी? तो मत खाओ ना। आप अपने आप को कंट्रोल में नहीं कर सकते? गुटका क्या कोई जबरदस्ती मुंह में बांध के खिलवा रहा है? मत करो ना। देखिए, आपके जीवन में यह मौका मिला कि आपने विचार बनाया। कोशिश नहीं; थूकना तो चाटना मत, चाटना तो थूकना मत, पर आवेश में नहीं। कभी अपना थूक चाटो, तो कैसा लगता है? जब तक मुंह में है, तभी तक ठीक है। कहने का मतलब, मात्र गुटके के लिए आत्मिक मत गिरना। यही तो गंदी आदत है, और आप इससे दुखी भी हो, निराश भी हो, पैसा भी खर्च कर रहे हो, खा के भी परेशान हो। अब हमेशा के लिए छोड़ना, और जब भी मौका मिले तो यहां आना। यह अपनी कुटिया है, यहां रहने-भोजन की व्यवस्था साधक के लिए निशुल्क है; कभी रहना हो, साधना करनी हो, तो आना।
अभी विचार बना और सलाह देने वाला मिल गया, विचार कामयाब हो गया। हम शुरुआत सत्संग की कर रहे थे और यह आपके लिए हो गया। अब इसे हमेशा के लिए त्याग दो; त्याग ही परम सुख है, लेकिन अब फिर अपनाना मत। देखो, जीवन में सबसे जरूरी क्या है? भोजन, सांस, पानी, और यह हमें प्रकृति देती है। तन ढकने के लिए कपड़ा समाज के लिए है; अकेले रहें तो कपड़े की जरूरत नहीं है। हम समाज में आना-जाना करते हैं तो तन ढकने के लिए कपड़ा चाहिए कि अभद्रता ना लगे। क्योंकि हमारे पास समझ है, हमें पता है क्या अच्छा है, क्या बुरा है, क्या उचित है, यह सब समझ के हमें जीना पड़ेगा। त्याग करना तो पूरी तरह करना। आवेश में, जज्बात में आके हम छोड़ तो देते हैं, दो दिन बाद फिर खाने लगते हैं। देखो, इन्होंने भी यहीं पर छोड़ा, बहुत सालों से खा रहे थे, और आज तक खाया नहीं, लेकिन इच्छा बहुत हुई।
क्या होता है, एक बार बुराई की आदत लग गई, तो अच्छाई करने के लिए हमें प्लानिंग करनी पड़ती है। देखो, बच्चों को शिक्षा देने के लिए हमें शिक्षक लगाना पड़ता है, ट्यूशन लगाना पड़ता है, लेकिन गाली सीखने के लिए कोई लगाया? और सबको अच्छी से अच्छी गाली आती है। अगर बैठ के गाली का खेल खेला जाए तो शाम हो जाएगी, कोई जीत नहीं पाएगा, कोई हार नहीं पाएगा। किसी ने ट्रेनिंग नहीं दी, किसी ने सिखाया नहीं, लेकिन कैसे सीख लेते हो? बचपन से आज तक एक व्यक्ति बताओ जिसने आपको एक मिनट भी गाली सिखाई हो। किसी से सुना, और उससे भी अच्छी-अच्छी नई गालियां अभी पैदा कर दोगे, अपने अंदर से। तो यह चीज ऐसे काम करती है: बुराई अपने आप पैदा हो जाती है, अच्छाई को पैदा करना पड़ता है। बुराई आपको कहीं से मिल जाती है तो उसकी अनेक अपने अंदर पैदा कर लेते हो। खेत में देखिए, फसल बोनी पड़ती है, हर साल लगानी पड़ती है, लेकिन जितनी फसल को नुकसान करने वाली चीजें हैं, वे अपने आप आ जाती हैं। इनको आज तक कोई निकाल नहीं पाया, ऐसी कोई दवा नहीं बनी कि इनका नाश कर दे।
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वीडियो: Live प्रत्यक्ष ज्ञान प्रश्न और उत्तर / #योगीजी_का_सत्संग · 2024-10-15