प्रश्नोत्तर P5-0094 · भाग 5
यहां व्यवस्था में क्या कमी है? एडजस्ट करना पड़ता है क्या?
यहां कमी क्या है, मुझे बताओ। आप जबरदस्ती नियम तोड़ रहे हो। क्या कमी है, मुझे बताइए। एक कमी बताओ। एकदम बताना, खुलकर। आपको क्या कमी इतने दिन में हुई? चलो, कोई भी मुझे बता दे। एक कमी कोई गिना दे। संकोच ना करना, क्योंकि लाइव में भी सुन रहे हैं लोग। खुल के बात करना। एक कमी मुझे गिना दो। यहां पर एक परेशानी आपको यहां हुई इतने दिन में, मुझे गिना दो। यह लाइव में भी संदेश जाएगा लोगों को।
ऐसा नहीं कि जिया हमने भी नहीं है। हम दो हजार उन्नीस में पांव धोने के लिए लोटे से धोते थे। हमने जिंदगी ऐसी नहीं जिया कि आप ही ऐसे रह रहे हो। मुझे अगर रहना हो तो मैं नहीं रहूं। मैं काम की वजह से आया हूं। अगर मुझे रहना हो तो मैं शहर में रहना पसंद करता हूं, क्योंकि मैं ज्यादा शहर में रहा करता हूं। मेरा रहना ज्यादा वही हुआ। मेरा अगर काम हटा दिया जाए तो मैं इतना बैठ भी नहीं पाऊंगा, और मैं यहां रह भी नहीं पाऊंगा। मैं आपको सीधा बता दूं। मुझे एक से दो दिन रहना भारी पड़ जाए। ऐसा नहीं कि व्यवस्थाओं में आप ही जिए हो। मैंने भी अच्छी से अच्छी व्यवस्थाओं का उपयोग किया है। मैं भी कपड़े में क्रीज नहीं पड़ने देता था। मैंने भी ऐसी जिंदगी जिया है। ऐसा नहीं है। लेकिन जब काम करना होता है, आदमी को उस लेवल पर आना पड़ता है, तभी काम होता है।
आप यह मत बताइए कि मैं बहुत अच्छे व्यवस्था से आ रहा हूं और मैं इसे यहां पर एडजस्ट कर रहा हूं। यहां पर एक नंबर की व्यवस्था है। मैं तो नदियों के किनारे ऐसे बिना बिस्तर का सोया था। वहां भी नहाने के बाद रात को कांपता था रात भर। और मैंने खुद की जिंदगी खुद के सपोर्ट से जिया है। ऐसा नहीं कि मैं अपने परिवार के बैकग्राउंड से जिया हूं। मैंने उस बैकग्राउंड को खुद खड़ा किया, और खुद मैं ऐसी लाइफ जिया हूं।
जब आप यह सुनाते हो कि मुझे एडजस्ट करना पड़ता है, मुझे आप पर हंसी आती है। क्योंकि यह आपका नाटक है, कुछ नहीं है। क्या एडजस्ट करोगे, बताओ? मुझे नहीं पता है आप लोग कैसी लाइफ जीते हो। क्या हमने नहीं जिया है? आप कभी पिछला प्रोफाइल देख लेना। हमने इसीलिए लोगों के लिए डाली है, कि देख लेना। ऐसा नहीं है। मैं पहले नहीं डाला था, बाद में मैंने डाला। जरा देख लेना। मुझे अपने लाइफ में जो करना था, मैंने पहले ही कर लिया। और मैं काम को काम के तरीके से करता हूं। बस ऐसा नहीं कि आप कार से उतरे हो। मैं भी कार चलाकर उतरा हूं। हमने भी कार जिंदगी में ली थी। ऐसा नहीं है। यह सब बातों को समझिए। अगर आपको कोई समय दे रहा है तो आप समय का उपयोग करिए, सदुपयोग करिए, दुरुपयोग मत करिए।
और जब मैं निकला था तब भी मुझे कुछ नहीं चाहिए था। आज भी मुझे कुछ नहीं चाहिए। ऐसा नहीं कि इस काम के पीछे मुझे कुछ चाहिए। मुझे तब भी कुछ नहीं चाहिए था, आज भी कुछ नहीं चाहिए। ना पाप, ना पुण्य, ना सत्कर्म, कुछ नहीं। मैं परमात्मा से अभी भी कहता हूं कि इतनी कृपा करना मुझ पर, कभी कृपा ना करना। मुझे कुछ नहीं चाहिए, तो नहीं चाहिए। बस यह काम मैंने मांगा था, यह काम मैं कर रहा हूं। लेकिन काम को काम के तरीके से करूंगा। आप लोगों की लापरवाही बर्दाश्त नहीं करूंगा। और आप ना सुनाओ कि मुझे एडजस्ट करना पड़ा। यहां कोई कमी ही नहीं है।
एडजस्ट तब करना पड़ता, कि दो में से एक कंबल दिया जाता। या तो दो में आधा तू मोड़े, आधा वह। तब मुझे बोलते कि पैर खुला है और मैं एडजस्ट कर रहा हूं। तब मुझे भी अच्छा लगता, यार यह आदमी एडजस्ट कर रहा है। आधा कंबल इसको उढ़ाया, आधा इसका इतना खुला है। कुछ देर यह ढकता है, कुछ देर वह ढकता है। तब मुझे लगता कि आप एडजस्ट कर रहे हो।
गर्म पानी सुबह मिल रहा है नहाने को। ब्रश है, मंजन है, साबुन है। इसके बाद यहां पर भोजन की व्यवस्था है, नाश्ते की व्यवस्था है। क्या कमी है कि एडजस्ट कर रहे हो? मुझे समझ में ही नहीं आ रहा है। कमी क्या है, बताओ? नाश्ते में, भोजन में, वही आप क्या एडजस्ट कर रहे हो, बताओ? कल भी, मैं क्या एडजस्ट कर रहा हूं, बताइए? क्या एडजस्ट कर रहे हो? यह एडजस्ट करना, एक रोटी हो, अगर चार टुकड़े हो जाएं, उसे कहते एडजस्ट करना। क्या वह स्थिति आपकी है? नहीं। घर से भी अच्छा, जैसी मां खिलाती थी वैसे आप खिला रहे हो। यहां पर एक ही कमी है, कि यहां पर कोई कमी ही नहीं है।
मैं एक-एक चुन-चुन के व्यवस्था करता हूं। किसलिए, पता है? आप लोग साधना कर पाओ, और किसी के लिए नहीं। एक आदमी को मैं, अगर साधक नहीं है, तो निकल लो। साधक के लिए बस, कि आप लोग साधना करके आपका आत्मिक स्तर उठे। ना मुझे गुरु बनना है, ना आपको चेला बनाना है। ऐसा कुछ भी नहीं। ना आपको दीक्षा देना है, ना लेना है। यहां बस करना है। मेरा भाव बस इतना है कि आप लोग आ रहे हो, आप लोगों का स्तर उठे, आप कुछ सीख सको, कुछ समझ सको, अपना आत्मिक कल्याण कर सको। इसलिए मैं काम कर रहा हूं। इन सब बातों को समझिए और आगे बढ़ो। और आप यह मत सुनाइए कि एडजस्ट कर रहा हूं। एडजस्ट यह कुछ ऐसा है ही नहीं। एक नंबर की व्यवस्था आप कर रहे हो। कमी हो तो बताओ। फिर जब कहोगे एडजस्ट कर रहा हूं, तो बात नहीं। आप लोग साधना करिए जिसके लिए आए हो। चाहे एक दिन रहो, लेकिन पूरी तरह। दो दिन रहो, पूरी तरह। आप लोग आ रहे हो तो घर पर बोल दो कि दो स्थिति में फोन करना। सीधी सी बात है। या कोई निकल जाए, या तो इमरजेंसी, आईसीयू में कोई जाए। इसके पहले मत करना। चाहे वह एक दिन रहो, चाहे दो दिन रहो। अगर यह बात ना जम पाए तो यहां से रास्ता वही जाता है, आपके घर तक। रास्ता तो बताने की जरूरत नहीं है। आपको किसी से पूछने की जरूरत नहीं। आने में तो पूछना पड़ा, जाने में तो पूछना भी नहीं पड़ेगा। अगर इस तरीके से नहीं रह सकते तो सीधा बस वही रास्ता आपके घर तक जाता है। सीधा घर चले जाइए। क्यों किसी को परेशान कर रहे हो।
मुझे कुटिया बनाने के पहले मैं आपको बताऊं। जिंदगी में अभी तक, कुटिया के पहले, कभी आटा और दाल का भाव मुझे मालूम करना नहीं पड़ा। ईंट का भाव मालूम नहीं करना पड़ा, सीमेंट का भाव मालूम नहीं करना पड़ा, लोहा का, दरवाजे का, यह सब भाव मालूम नहीं करना पड़ा। अब सब मालूम। गिट्टी का, रेत का, खिड़की का, अब सब मालूम करना पड़ रहा है। आज तक अपने जीवन में इतनी मेरी उम्र हो गई, मुझे कभी सब्जी का भाव नहीं मालूम करना पड़ा, कि प्याज कैसे किलो। हमसे कोई मतलब नहीं रहा। अब मालूम करना पड़ रहा है। यही मैं देख रहा हूं। कभी मेरे जिंदगी में ऐसा मौका आया नहीं, क्योंकि मैं कभी खुद बना के घर में रहा नहीं। ऐसा कभी जिंदगी में मौका नहीं आया। मुझे कभी भाव-ताव यह सब जानने की जरूरत ही नहीं पड़ी, कि सब्जी और दाल का मुझे पता करना पड़े क्या भाव है, ईंट-पत्थर पता करना पड़े। कभी नहीं ऐसा मौका मिला। अब मौका मिला है। अब मुझे पता करना पड़ता है, पन्नी कितने की आई, यह धागा कितने का आ रहा है। अब पता करना पड़ रहा है। मेरा मकसद है कि लोगों को इससे लाभ मिले। बड़ी मानवता है। लाभ मिले तो। ना लाभ मिले तो यह काम बंद हो जाए। कोई मतलब नहीं है। काम करके कुटिया बना के, यह हमें सब दीवारें नहीं खड़ा करना। यह हमें ईंट-पत्थर जिंदगी में नहीं जोड़ना। यह काम बंद हो जाए। अगर ना हो तो कोई मतलब नहीं है।
मैं इनके क्षेत्र में घूम रहा हूं दो हजार उन्नीस से। आज तक हमने किसी के दरवाजे पर जाके कभी नहीं बोला कि मुझे एक गिलास चाय बनाओ, या भोजन बनाओ। कभी नहीं। एक रुपया किसी से लेना-देना नहीं। दो हजार उन्नीस से इनके क्षेत्र में रह रहा हूं। यह सब बनाने में भी मैंने आज तक किसी से बोला नहीं कि मुझे कोई सहयोग दो। लोगों ने बोला, हमने ही मना कर दिया। हम कहे, नहीं। मेरी जिंदगी एकदम साफ-सुथरी है। मैं काम को काम के तरीके से करता हूं। मुझे काम को काम करना है। मुझे यह नाम, शोहरत, पैसे के लिए मैं काम नहीं कर रहा हूं, कि बस आए साधक, भीड़ देख ली, इतने साधक हैं। नहीं। मैं अभी भी समझा रहा हूं। अब तो आगे मैं यही कहने वाला हूं कि भाई, कर लो, हो गया। हो गया, क्या करूंगा? आज जिस कार्य के लिए आप बैठे, वह काम नहीं होगा तो फिर क्या करेंगे? अच्छा बताओ, क्या करेंगे? यहां रह के। हमें भी हो गया। बारह साल से घूम रहा था। अब मुझे भी, मैं भी फोन नहीं दबा पा रहा हूं। मैं भी तो आप लोगों के लिए बैठा हूं। आप लोगों का इंतजार कर रहा हूं। आप लोगों की व्यवस्था दूं। आप में लगा हूं। तो आपको जब लाभ ही नहीं हो, हम यहां रह के क्या करेंगे? आप ही बताइए। यही ईंट जोड़ना बस यही रह गया। इस उम्र में बाल पक गए। अब यही रह गया। मुझे जब जोड़ना था जवानी में, तब तो यह जोड़ा नहीं। अब मैं यही करूंगा। भाई, यह सब का शौक कब होता है, जब युवा अवस्था रहती है। वह तो गई।
इसलिए कहीं भी जाइए, वहां के नियम को पूरी तरह पहले पूछिए। व्यवस्था बाद में पूछ लेना। शौचालय भी देखो, दोनों तरह का मैं बनवाया। मैं खुद देख-देख के यहां काम किया हूं। दोनों तरह का बनाया हूं। बोलना नहीं पड़ा। गीजर के लिए मेरे से कोई बोला थोड़ी। हमने खुद लगाया। और मैं आज तक उस गीजर में नहीं नहाया हूं। मैं सीधा जाता हूं, कूदता हूं, चला आता हूं, स्नान करता हूं। आज तक हमने उस गीजर का उपयोग नहीं किया। वह गीजर किसके लिए लगा? आप लोगों के लिए लगा। मुझे पता था ऐसे लोग आएंगे जिन्हें जरूरत पड़ेगी। यहां तो जितनी सुविधाएं साधक के लिए जरूरी हैं, वह हैं। आप इतनी व्यवस्था, इतनी स्वतंत्रता में साधना नहीं करोगे, कैसे करोगे? आप मुझे बताओ, आपके लिए क्या किया जाए? मैं और एक आश्रम का निर्माण करूं क्या? एक आश्रम का और निर्माण करूं, वहां पर आप लोगों को भेजूं? फिर आप बोलिए कि हमें ऐसी व्यवस्था चाहिए। यहां का तो सिस्टम बन गया है। अगर कोई व्यवस्था चाहिए तो मुझसे कहिए। मैं वहां फिर एक और आश्रम का निर्माण करने वाला तो हूं, आगे जाकर, परिक्रमावासियों के लिए। तो आपके लिए एक और आश्रम का निर्माण करें। आप लोग बताइए कि मुझे ऐसी-ऐसी सुविधाएं चाहिए, और इस सुविधा के द्वारा मैं एकदम परम स्थिति को उपलब्ध हो जाऊंगा। मैं वैसी भी व्यवस्था कराऊं, जितना मुझसे हो सकेगा। आप कह के देखिए। हम आपको कराएंगे। बस मुझे लगना चाहिए कि उसमें आपका स्तर उठेगा। मुझे भी लगना चाहिए। अगर ऐसा कुछ है तो बोलो। ऐसा कुछ है तो बोलो कि भाई, मुझे यह सुविधा दो तो हमारा स्तर और उठ जाएगा। यह आसन मुझे लाओ तो मेरा स्तर और उठ जाएगा। मैं करूंगा व्यवस्था, अगर उचित रहा तो। कुछ नहीं। आप लोग आए हो इतने दिनों में, आपका कोई नाम नहीं पूछा। कोई एक आदमी आपको टोका नहीं, कि यहां क्यों बैठे हो, और क्या चाहिए आपको।
हम इनके क्षेत्र में इतने सालों से घूम रहे हैं। कभी कोई कह नहीं सकता कि हमने किसी से एक रुपया मांगा। कभी नहीं, आज तक नहीं। एक कपड़े पर मैं जीता हूं। बोल नहीं सकता कोई। इतना शुद्धता से हम जिंदगी को जीते हैं। मेरा भाव बस इतना है कि आप लोगों का आत्मिक स्तर उठे, और आप परम स्थिति को उपलब्ध हो। मेरा भाव यह है। मेरा भाव यह नहीं है कि आप भटकते रहो। मैं इस काम की शुरुआत इसलिए किया हूं कि लोग उस परम स्थिति पहुंचें। और मुझे इतना मालूम है कि अगर आप प्रयास करोगे तो दुनिया की कोई ताकत नहीं सकती। वह स्थिति आपकी मूल है। यह मुझे पक्का पता है। और आप नहीं प्रयास करोगे, मैं आपको बोलता हूं, दुनिया की कोई ताकत आपको पहुंचा भी नहीं सकती। यह भी आप समझ लीजिएगा। कोई पैदा नहीं हुआ। ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी प्रत्यक्ष आ जाएं, आपका कुछ नहीं कर सकते। और अगर आप चाह लो अपना आत्मिक कल्याण, तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी रोक नहीं सकते। यह भी आपको बता दूं। यह आपको पक्का बता रहा हूं। ऐसे ही नहीं। यह मेरा व्यक्तिगत जीवन का अनुभव है। इसलिए मैं आप लोगों को बोलता हूं कि आप लोग प्रयास करिए। यह आप कर सकते हो, आराम से, बहुत आराम से। लेकिन उसके लिए आवेश और जज्बात दोनों हटाने पड़ेंगे। आवेश और जज्बात, यह दोनों हटा के आगे बढ़ना पड़ेगा। यह ध्यान रखना। आवेश और जज्बात में आए, तो गए। आवेश, जज्बात, जरा सा विपरीत हुआ, लो मैं जा रहा हूं। होम जाने के लिए आए। मेरे घर पर कोई कमी है क्या? यह है आवेश और जज्बात।
प्रेम में झुक के रहना सीखो। सीखने में झुको। जहां सीखना है, वहां झुकना पड़ता है। पानी कहां जाता है? ऐसे-ऐसे ज्ञान ऐसे जाता है। जरा सा ऐसे किए, सब आ गया। चलो, खत्म। क्या हो गया? वापस भर रहा था, लेकिन आपने ऐसे कर दिया, गया, सब खत्म हो गया। हो गया काम। निकल लिए, गठरी लेके सर पर ला लिए, और जहां से आए थे आवेश ने पहुंचा दिया। जन्म-जन्म से चिल्ला रहे थे, कोई मिले, मार्ग बताए। मिले, मार्ग बताए, तो काला टाइट कर लिए और निकाल लिए गठरी लेके। यही होता है। प्रार्थना कर रहे थे, कोई मिले मुझे, मार्ग बताए। हे परमात्मा, कुछ दया करो, मुझ पर कृपा करो, कोई मुझे मिल जाए, कोई सदगुरु से मिलाओ, कोई गुरु से मिलाओ, कोई मुझे मार्ग बताए। और जब पहुंचते हैं तो वहां क्या आ जाता है? आवेश और जज्बात। कि लो, मैं जा रहा हूं। मेरे यहां कोई कमी है क्या? बस निकल लिए। गठरी लाद ली। फिर से गठरी लाद ली। कैसे। गुरु ने मेहनत करके कुछ उतरवाया था, लेकिन नहीं, तुरंत लाद ली, और कहे मैं जा रहा हूं। उसने कितनी मेहनत की आपके लिए। आपको समझ में आ रहा है। वह व्यक्ति दिन-रात आपके लिए लगा रहा, और एक झटके में आपने कहा लो, जा रहे। सोचिए जरा। एक व्यक्ति रात-दिन आपके लिए लगा रहा, और आपने एक झटके में उसकी मेहनत को खत्म कर दिया। एक झटके में गठरी लाद ली और निकल लिए। और वह देखता रहा आपको। वह रोक नहीं सकता। वह व्यक्ति रोक नहीं सकता। बात यह है। वह यह भी नहीं कह सकता कि आप रुको। समझो, यह हालत है।
जीवन लगा के उसने खोजा। उसकी जिंदगी चली गई। और फिर जब देने लगा, तो कुछ आप में, फिर एक मेहनत वहां किया, और एक मेहनत फिर आप पर करना पड़ा। और फिर एक झटके में आप आवेश और जज्बात में आए। और आए किसके लिए, पता है? व्यवस्था के लिए। शब्दों में, शब्दों के जाल में फंसे, और व्यवस्था में फंसे। और बस उसने जितना दिया था, ले, गठरी उठाए, और निकल लिए घर पर। सोचिए जरा उसका। मतलब उसने कितनी मेहनत आपके लिए किया था। आप सोच सकते हो। वह व्यक्ति आपको पूरी व्यवस्था देकर सुला रहा है। और वही व्यक्ति कुछ साल पहले नदियों के किनारे पड़ा था, ऐसे पागल की तरह कांप रहा था। कैसे-कैसे मेहनत कर-करके वह व्यक्ति उस स्थिति पर पहुंचा, और आपको सीधा बता रहा है। और आपके आवेश और जज्बात ने उसे एक झटके में खत्म कर दिया। फिर वह देख रहा है आपको। गठरी जाते हुए देखो, जहां से आया था, फिर चला गया। फिर उसी दुनिया में। रोक भी नहीं सकता। रोकने का अधिकार उसके पास नहीं है। यह हालत है। वह तो बस देखता रहा। क्योंकि अब तो वह उस पीड़ा से मुक्त हो गया, उस तकलीफ से वह मुक्त हो गया, उस अशांत भरे जीवन से मुक्त हो गया। वह तो बस आपको देख रहा है, कि जहां से आया था, फिर वही निकल लिया। वह तो आपको रोक भी नहीं सकता। उसने तो अपने आप को निकाल लिया, और आपके लिए मार्ग खोजा था। और आपने बड़ी प्रार्थना की थी कि मुझे कोई मार्ग बताए। आपकी भी प्रार्थना थी कहीं न कहीं। और जब बताने वाला मिल गया, तो मात्र कुछ जरूरतों के लिए, झूठी मान के लिए, कि बस शब्दों की बात थी और बात कुछ नहीं थी। और उस शब्दों के जाल में फंस के, और कहे मैं तो अब जा रहा हूं।
इस मार्ग की खोज में मैं इतना पागल हो गया था कि मुझे जानवर भी मुझसे भागने लगे थे। आदमी तो छोड़ दो। मेरे पास जानवर तक नहीं आते। मैं अगर खड़ा हो जाऊं तो मेरे पास जानवर तक नहीं आते थे। आदमी तो छोड़ दो। मैं जब तक ना बोलूं। जानवर मुझे देख के भाग जाते। इस स्थिति में मैं अपने आप को ला दिया था खोज में। यह इतनी आसानी से नहीं मिल गया है कि किसी ने मुझे गिफ्ट दे दिया है। इसमें मेरी जिंदगी लग गई। कभी-कभी मैं सोचता था, इससे अच्छी मौत है। एक बार खत्म, खूबसूरत है। एक बार मार देती है। इतना मुझे अथाह में, कि कभी-कभी मैं लगता था कि मौत इससे प्यारी है। एक बार में खत्म कर देगी। कि मैं ऐसे ही नहीं, प्रत्यक्ष ज्ञान मिल गया है, कि ऊपर वाले ने ले ली बात। इसके लिए जिंदगी चली गई। और इसके पीछे पूरी तरह मेहनत है। मेरी मेहनत है इसके पीछे। ऐसे ही नहीं मिल गया। कहने का मतलब इतना है कि आप लोग लाभ लीजिए। आवेश और जज्बात को हटा दीजिए। यह आपको गिरा देंगे।
आवेश एक झटके में ऐसे भरता है, और तुम एक झटके में कहते हो, लो निकल। जैसे जो हठयोग करते हैं, तो हठयोग भी क्या, आवेश, उसको भी आवेश बोल सकते हैं कि वह किस स्थिति में कर रहे हैं और किसके लिए कर रहे हैं। हठयोग कर रहे हैं कुछ नहीं चाहिए कि, जैसे सब कुछ करके जब थक जाता है तो एक स्थिति होती है। तो वह क्या, उसे आवेश नहीं बोल सकते। वह स्थिति होती है। कर-करके जब करने के लिए कुछ नहीं रहता, तो एक स्थिति होती है। वह आवेश नहीं। आवेश तो तब है जब पहले दिन ही कर बैठो। आवेश तो तब है जब पहले दिन ही कर बैठो। सालों-साल मेहनत करता है। जब नहीं होता, थक जाता है, खोज करके, कर-करके, तो हठयोग एक स्थिति है। आवेश पहले दिन का है।
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