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प्रश्नोत्तर P5-0036 · भाग 5

(संदर्भ: कुटिया निर्माण) इतने जीव मरते हुए दिख रहे थे फिर भी कुटिया क्यों बनाई?

तकलीफ होगी, होगी वो जाने। उसका जिम्मेदार मैं नहीं हूँ। लाखों जीव हमारे पैरों के नीचे मरते हैं, उसका जिम्मेदार मैं नहीं हूँ। क्या मैं आसमान में चलूँ। मेरे पास और रास्ता नहीं है। जब आप चलेंगे तो हजारों जीव मरते हैं, ये सबको पता है। आप गाड़ी ले जाते हो, लाखों जीव मरते हैं। घर बनाते हो तो लाखों करोड़ों जीव मरते हैं। मुझे पता है। मैं जब ये कुटिया का निर्माण कर रहा था, उसके पहले मेरे आँखों से भर-भर आँसू ही गिरते थे। क्योंकि मैं इतने जीवों को लगभग मरते हुए देख रहा था कि अब ये मरने वाले हैं। उसका जिम्मेदार एक व्यक्ति होगा, ये खुद। और इतने लोग आएँगे-जाएँगे। इतनी यात्रा में जितने जीव मरे होंगे, उसका जिम्मेदार ये व्यक्ति बनेगा। लेकिन कोई बात नहीं। बहुत जरूरी है। और मैं देख पा रहा था। नई खुदाई होगी, उसमें कितने जीव मरेंगे, क्या-क्या होगा। लोग गाड़ी से आएँगे, जाएँगे। उसमें मैं निमित्त बना हूँ। आप यहाँ तक आए, तो कौन निमित्त बना। मैं बना। अब कोई भी गाड़ी से आ रहा है, इस रास्ते से उसकी गाड़ी में कितने जीव मर रहे हैं। उसका जिम्मेदार कौन हुआ। आप नहीं, ये व्यक्ति हुआ, क्योंकि आप इस व्यक्ति के लिए आ रहे हो। मैं सब देख पा रहा था। अगर मेरे लिए घर बनाना होता, तो मैं कभी नहीं बनाता। ये बना है तो पूरी तरह समाज कल्याण के लिए। नहीं तो मैं नहीं बनाता। साफ-साफ बता दूँ, मैं नहीं बना पाता। इतने जीवों की हत्या मैं एक घर के लिए नहीं कर सकता। मैं अपना जीवन कहीं भी काट लेता। बारह-तेरह साल के ऊपर तो मैंने काटा ही, घूम-घूम के। लगभग चालीस वर्ष पूरे हो गए, बीत गए। कुछ ही तो बाकी है। घूमते-फिरते, वैसे भी कब निकल जाए पता नहीं। तो मैं अपने लिए तो घर नहीं बना सकता था। मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी। यदि एक घर, मुझे रहने के लिए, इतने जीवों की हत्या हो, मैं नहीं कर सकता था। और ये सब मुझे दिख रहा था। ये मरेंगे, और उसका जिम्मेदार मैं रहूँगा। कोई बात नहीं। ये कार्य बहुत जरूरी है, बहुत ही जरूरी है। इसकी भी सजा मैं भोगने के लिए तैयार हूँ। मैंने पूरी तरह स्वीकार किया है कि इसकी भी सजा मैं भोगने के लिए तैयार हूँ। मैं भोगूँगा। ये कार्य मानव के लिए बहुत जरूरी है। और अगर ये प्रत्यक्ष ज्ञान मुझे लोगों तक पहुँचाना है, तो मुझे ये करना ही पड़ेगा। नहीं तो आज जितना एकांत में हम आपसे बात कर रहे हैं, अगर मैं कहीं और होता, आप कहीं और होते, आपके घर पर भी इतना एकांत आप नहीं कर सकते थे। आपकी सोसाइटी थी, लोग थे, आपका परिवार था। नहीं कर पाते। इसलिए मुझे करना पड़ा। और मुझे सब दिख रहा था, साफ-साफ। कई दिन तक तो मैं उठ-उठ के रोने लगा। लेकिन करें क्या, फैसला ले लिया था, बनाना है। और जब फैसला ले लिया, तो कई-कई दिन रात को रो-रो के उठता, जाग जाता, रोंगटे खड़े हो जाते। क्योंकि सब अब मरने वाले हैं, और उस निमित्त मैं बनने जा रहा हूँ। और ऐसा नहीं कि इस शरीर के जाने के बाद बंद हो जाएगा। यहाँ आएँगे। जाने के बाद भी मेरे द्वारा हत्याएँ होंगी। इतना मैं देख पा रहा था। लेकिन कोई बात नहीं। हम तो अपने बचपन में जब स्वर्ग और नरक के बारे में सुनते थे, तो मैं प्रार्थना करता था कि मुझे नरक देना, क्योंकि नरक में मैं कुछ काम करूँगा। स्वर्ग में तो सब सुखी बैठे रहेंगे। वहाँ जाके करेंगे क्या। तो ठीक है, कोई बात नहीं। भुगत लेंगे, जितना भी होगा। ये हाल है। और सब साफ-साफ दिखता था, समझ में भी आता था, दिख भी रहा था। पर जरूरी है, बहुत जरूरी है।

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वीडियो: कैसे पता चलेगा कि मुझे आत्मज्ञान हो गया है ? / योगीजी_का_सत्संग · 2025-04-18