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प्रश्नोत्तर P5-0033 · भाग 5

मन समोसा खाने को कहे तो क्या करें? मन को कैसे कंट्रोल करें?

भूख लग रही है तो कुछ भी खा सकते हैं। पर मन कह रहा है कि समोसा खाना है। अगर हम केवल जरूरत में रहेंगे तो रोटी खा लेंगे, और उस चीज को टाल देंगे। पर जब भूख लगेगी दोबारा, फिर मन करेगा समोसा खाने का। अगर आपकी पॉकेट अलाउ कर रही है तो समोसा ही खा लो, कम से कम मन वहाँ से चला जाए। समोसा ईमानदारी के पैसे से खाना। बस इतनी सी बात है। समोसा खाना गिरना नहीं है। समोसा को किस तरीके से खा रहे हो, बात ये है। जैसे अगर आपने कभी समोसा नहीं खाया, समोसा नहीं देखा, तो मन समोसे पर जाएगा? नहीं जाएगा। जब आप खा लेंगे एक बार, स्वाद ले लेंगे, तो जब भूख लगेगी तब होगा, चलो नाश्ते में समोसा ही ले लेते हैं। पहले आदमी नशा नहीं करता था, तो उसका मन नशे पर एक बार भी नहीं जाता था। जब आदमी ने कई सालों तक नशा किया और उसके बाद छोड़ना चाह रहा है, कह रहा है मेरा मन नशे पर जा रहा है। मन नहीं, उसने अपनी आदत बना ली है, शरीर की आदत बना ली है। पहले नहीं जाता था। अगर मन जाता तो पहले भी जाता। आपने उसकी आदत डाली। शरीर को आदत पड़ गई। जब शरीर को कोई जरूरत होती है तो मन इंगित करता है। जब तक आपको भूख है तभी तक स्वाद भी अच्छा लगता है। भूख जाने के बाद स्वाद की इच्छा भी खत्म हो जाती है। जैसे ही भूख लगेगी, फिर आ जाएगा। मन सिर्फ इंगित करता है। देना या ना देना आपके ऊपर है। आपने शरीर को आदत डाली है, वही मन इंगित करता है। नहीं देते हो तो लगा रहता है, इसलिए कि आदत डाली है। मन नहीं लगा रहा, आप लगे रहोगे मन के द्वारा। समोसा नहीं खाया, रोटी खा ली, तो अगली भूख तक दिमाग में समोसा घूमता रहेगा। पेट भर गया, जरूरत पूरी हो गई, लेकिन स्वाद की इच्छा है। ऐसे समय ईमानदारी से अगर धन है तो समोसा खा लेना चाहिए। और अगर शरीर को नुकसान हो रहा है, तकलीफ हो रही है, या समोसा खाने से किसी को तकलीफ हो रही है, तो नहीं खाना चाहिए। मन को कैसे कंट्रोल करें? वो धीरे-धीरे हट जाएगा। मन को कंट्रोल नहीं कर सकते। कंट्रोल करना भी नहीं है। आपको भूख लगी, भोजन करा दो। मन आपके लिए काम ही नहीं करता। मन शरीर के लिए काम करता है, ना कि आपके लिए। जैसे ही भूख लगी, मन भोजन पर जाएगा। भूख मिटा दी तो अगली जरूरत में चला जाएगा। मन सबसे सहायक है, आपकी जरूरतों को इंगित करता है। आपको एक कार चाहिए, एक ब्रांड सोच ली। जब तक नहीं खरीदोगे, जरूरत पूरी नहीं हो रही। दूसरी कार खरीद लोगे तब भी मन करेगा कि वो वाली मेरे पास नहीं है, क्योंकि आपने चॉइस किया है। ऐसे समय अपनी क्षमता देखो, अपनी जरूरत देखो, और अगर है तो पूरा कर डालो। नहीं है तो छोड़ दीजिए। दो चीजें होती हैं। या तो मेरी योग्यता ऐसी है, या मेरी जरूरत है। दोनों देख लीजिए। जरूरत नहीं है और कार ले रहे हो, फंस जाओगे, तो मत लीजिए। समझदारी से काम करिए। मन में बार-बार आएगा कि योग्यता है, कर सकते हो। अगर मैं ये ले लेता हूँ तो फंस जाऊँगा, तो समझ में आ जाएगी। मन जो काम करता है, तरकीब भी लेके आता है। इंद्रियाँ चार-पाँच हैं। एक तरफ समोसा, दूसरी तरफ आत्मज्ञान, वो विचार है, मन नहीं। मेरे लिए तो एक ही है। चाहिए तो मन है। बस बात खत्म। नहीं चाहिए में मन कहाँ है। मन, विचार, विवेक, सब एक ही में आते हैं। विचार का समूह एक मन लगता है। चाहिए तो मन है, और नहीं चाहिए तो तब भी नहीं है। अपने आप को रोक दिया तो खत्म हो गया। अगर आपका मन है ही नहीं तो बात खत्म हो जाती है। पर अगर मन है तो या तो करोगे या नहीं करोगे, आपके ऊपर है। करोगे तो आदत पड़ रही है। नहीं करोगे तो छूट जाएगा। आप छोड़ोगे तो छूट जाएगा। समझ कर देखो, क्या जरूरत है। मन शरीर के लिए काम करता है, आपके लिए नहीं। बहुत जगह आप जवाब देना चाहे, लेकिन रुक गए। चाहे माता हों, पिता हों, भाई हो, सीनियर हो, जूनियर हो। बहुत जगह आप जवाब दे सकते थे। मन ने कहा दो, लेकिन आपने जवाब नहीं दिया। बाद में पछतावा भी होता है। पछतावा इसलिए होता है कि कहीं ना कहीं दबाव में, संकोच में नहीं दिए। दबाव और संकोच में बात नहीं करनी चाहिए। अपनी बात रख दीजिए। निमित्त मन है। मन सहायक है। मन को दोष में मत देखिए। मन सिर्फ निमित्त है। ये आँख है। इन आँखों से आप क्या देख रहे हो, आपके ऊपर है। क्या आँखें दोषी हैं? आप उस दृश्य को देख रहे हो। सामने वाला नहीं चाहता और आप देख रहे हो, तो देखने में आँख का दोष है कि आपका? आपका। दृश्य आया तो नहीं भी देख सकते थे। जितना आपने निर्माण किया है, वो लालच में बनाया, बेईमानी से, और आपको पता है। शराब किसने बनाई? प्रकृति ने बनाया कि आपने बनाया? समाज ने सिखाया कि शराब गंदी है, तो आप क्यों सीख लिए? बचपन से बताया गया। बच्चों को पिलाओगे? पत्नी को पिलाओगे? माँ को पिलाओगे? क्यों नहीं पिलाओगे? क्योंकि आपको पता है।

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वीडियो: कैसे पता चलेगा कि मुझे आत्मज्ञान हो गया है ? / योगीजी_का_सत्संग · 2025-04-18