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प्रश्नोत्तर P5-0016 · भाग 5

(कुटिया में एक युवक) किताबों में पढ़ते हैं कि दूसरों के अनुभव से सीख लो; गीता में श्री कृष्ण ने बताया कि ये काम करो, ये मत करो — पर सुनकर, ज्ञान और समझ होते हुए भी मन नहीं मानता, कहता है एक बार करके देखते हैं। आपने भी कहा था कि आप हर जगह गए, यह देखने के लिए कि वहां कुछ नहीं है। तो जब कृष्ण ने कह दिया कि भगवान बाहर नहीं है, फिर भी मन मानता नहीं — मन को कैसे मनाऊं? किसकी बात सही मानूं?

मन बोल रहा है, कि आपकी जरूरत बोल रही है, या आपका लालच बोल रहा है — ये बताओ। (मेरे बारे में —) कई लोगों ने मुझसे कहा कि कहां घूम रहे हो? मैंने कहा — खोज रहा हूं। तो उन्होंने कहा कि भगवान तो अंदर है। मैंने कहा कि मुझे पता है बाहर है, तो पहले मैं बाहर खोज लूं, तो बचेगा अंदर — एक पक्ष तो क्लियर करो। मुझे पता है बाहर है, आप कह रहे हो अंदर है — और आप सिद्ध भी नहीं करा पा रहे हो, आप भी तो तुरंत दिखा नहीं पा रहे हो, बस कह ही रहे हो ना? तो मैं एक काम करता हूं — एक जगह तो खोज लूं, आखिर में अंदर तो बचेगा। (कृष्ण ने कहा भगवान बाहर नहीं —) बाहर-अंदर क्या है, पहले ये बताओ — चलो, मैं आपसे पूछ रहा हूं। पहले बाहर और अंदर को क्लियर करो। (बाहर और अंदर जगत एक ही है —) अंदर क्या है? अंदर तुम कहां हो? तुम्हारे अंदर पंच तत्व हैं, चीजें जो हैं — तुम उसमें कहां हो? अंदर हो, (कि) बाहर हो? ठीक है — तुम कहां हो? (वही तो मैं पूछ रहा हूं कि ये कौन बोलता है कि मुझे जानना है —) वो आपसे पूछ रहा हूं, क्योंकि अंदर-बाहर का नाम आपने ही लिया। (मैं तो अहंकार, अहम हूं —) तो हो कहां? कोई तीसरा भी स्थान है क्या? एक अंदर, एक बाहर — कोई तीसरा स्थान है? नहीं ना? तो तुम अंदर हो कि बाहर, मुझे ये बताओ। (मैं तो कहीं नहीं हूं —) तो जब तुम कहीं हो ही नहीं, तो अंदर-बाहर का कैसे पता चला? तो फिर ये कौन है, जो मान रहा है कि मैं हूं? तो फिर आपसे बात भी आगे नहीं कर पाऊंगा मैं, क्योंकि आप जवाब नहीं दे पा रहे हो। तुम कहां खड़े हो, वो तो बताओ मुझे, तब मैं आपसे बात करूं ना। (मुझे नहीं पता मैं कहां खड़ा हूं —) तो अंदर कैसे बोला कि अंदर भी है? अंदर गए नहीं, तो अंदर कैसे बोल दिया? (किताबी ज्ञान —) ये पहले खोजना पड़ेगा कि आप कहां खड़े हो — बाहर कि अंदर। अगर बाहर खड़े हो, तब अंदर जाओ; और अंदर खड़े हो, फिर अंदर तो है ही नहीं — नहीं तो मिल गया होता। तो देखना है कि आप खड़े कहां हो — वो खोजना पड़ेगा। (और अगर किसी ने बता दिया —) बताने से क्या होता है? प्रत्यक्ष होना चाहिए। (तो अंदर कैसे जाया जाए?) अगर अंदर आपकी खोज है, तो अंदर जाने के लिए काम करो ना, फिर रास्ता पूछो कि कैसे जाऊं। मैं तो (रास्ता) तब बताऊंगा, जब आप ये बता पाओगे कि मैं कहां खड़ा हूं। (शास्त्रों-वेदों में ऋषियों ने अनुभव लेकर बता दिया कि कौन सा रास्ता सही है, कौन सा गलत; पर मन कहता है इधर भी जाकर एक बार देखूं — और आपने कहा कुछ है ही नहीं, तो क्या मैं समझना बंद कर दूं? फिर अंदर से कौन आवाज करता है कि एक बार देख के तो आओ?) देख लो, कौन आवाज करता है — एक तुम ही तो हो। (मैं वहीं अटक जाता हूं, परेशान आदमी हूं —) हां, ये परेशान आत्मा है — तो अपनी परेशानी दूर कराओ, इलाज कराओ, सही से। (इसका इलाज कहां होगा?) अध्यात्म (में), गुरु के पास। तो जैसे बताया जा रहा है, फिर वैसे करो। (ब्लाइंडली कैसे फॉलो करें, कैसे पता चले कि यह सही बोल रहा है?) अनुभव कब होगा? जब उस पे काम करोगे। (एक साधिका की बात के बाद) इन्होंने इतना सत्संग सुना, तो इन्होंने एक पॉइंट पकड़ा कि बाहर कुछ नहीं है; लेकिन उसके बाद भी मैंने बोला है, उसके पहले भी बोला है, कि राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, 'मेरा', कर्ता के भाव से मुक्त होना है — तो उसको इन्होंने क्यों नहीं पकड़ा? क्योंकि उस पे काम करना पड़ेगा। मैंने ये भी तो बोला है — बोला है कि नहीं बोला है? तो इसको क्यों नहीं पकड़ा आपने? अब मुक्त होना है — (तो) उस पे काम करेंगे। (और अगर बाहर कुछ नहीं है,) तो फिर कुछ मत करो, तो भोजन भी मत करो — आप स्थिर हो जाओ। आपने मेरी बात मान ली ना कि बाहर कुछ भी नहीं है, तो बात खत्म करो — अगर इस बात को मान लिए, (तो) आप उसी जगह स्थिर हो जाओ। (फिर अंदर कंफ्यूजन क्यों होता है कि ये बात गलत भी हो सकती है?) गलत हो सकती है, तो जहां सही हो, वहां जाओ — किसी पे तो भरोसा कर लो; चलना ही पड़ेगा ना। (किसी को भी पकड़ लूं — ये भी तो गलत है —) तो मत पकड़ो ना। जब गलत ही है, तो तुम डिसाइड करो, तुम्हें चलना है। (अलग-अलग का ज्ञान अलग होता है, यही कंफ्यूजन देता है —) अलग-अलग का तरीका अलग-अलग होता है, अलग-अलग का ज्ञान नहीं होता — अभी शिद्दत नहीं है। ज्ञान अलग-अलग का क्या होता है? हम शब्दों को ढो रहे हैं। जब हमने कहा कि कुछ नहीं है — अगर मान लीजिए आपने मुझे सुना — तो मैंने आपसे ये भी तो कहा कि राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, 'मेरा', कर्ता के भाव से मुक्त हो; जब आप कर्म कर रहे हो, तो उसमें छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड मत करना; कर्म आपके द्वारा हो रहा है, तो ठीक — तो आप इसको करो। अगर इससे नहीं पहुंच पा रहे, तो दूसरा अपनाओ। एक (तो) करो। मैंने आखिरी शब्द बोला है कि उम्मीद से अपने आप को मुक्त करा लो। जब (आप) राग-द्वेष से (मुक्त हो जाओ), उम्मीद से मुक्त करा लो, (और) अगर नहीं हो, तो फिर देखो। लेकिन इतना करने के बाद (ही) — ऐसे कैसे फैसला ले लोगे कि नहीं, सब गड़बड़ है? तो (या) तुम आलसी आदमी हो — करना-धरना कुछ नहीं है, बस बातें करनी हैं, सबको जाके उलझाना है। किसी के पास जाओ, (तो) जैसा बता रहा है, पहले पूरी तरह उस मार्ग पे चलो; पूरी (तरह) चलोगे ही नहीं, (तो) पता कैसे चलेगा? चलने के पहले कैसे कह सकते हो (कि) यह गलत है? (जैसे कृष्ण को मैं मानता हूं, कृष्ण बोल रहे हैं कि ये चीज गलत है —) तो कृष्ण की बात अगर मान ली कि ये गलत है, तो कृष्ण (ने) क्या बोला, वो करो। और अगर कृष्ण की भी (बात) आप गलत मान लिए, तो मान किसकी रहे हो? (जिसकी मान रहे हो,) उसकी करो — नहीं (तो) बेमतलब का, फालतू सबको उलझा रहे हो कि सब गलत है, तुम ही एक सही हो। अगर कृष्ण ने ये बात कह दी (कि यह) गलत है, और कृष्ण की बात आपको एकदम सही लगी, (और आप कृष्ण को) एकदम पक्का (मानते हो), तो कृष्ण ने भी कुछ (मार्ग) बताया होगा — तो वैसे चल दो। मूल पहुंचना है, चाहे जैसे भी — चलना तो पड़ेगा ही। एक को तो पकड़ना पड़ेगा, बेटा — एक साधन को पकड़ना पड़ेगा ना। कृष्ण ने कहा यह गलत है, (तो) वो छोड़ के कृष्ण ने जैसा कहा, वैसा करो। और फिर अगर वो करके मुझे मेरी राह नहीं मिलती, तो फिर कृष्ण (से) पूछ लेना; फिर कृष्ण झूठा हो जाएगा, फिर दूसरा पकड़ना। चलो तो सही — चलना तो पड़ेगा पहले। अच्छा, मैं आपसे एक बात पूछता हूं — कृष्ण भगवान ने कहा ये गलत है और ये सही है, तो आपने कृष्ण भगवान की बात कैसे सही कर दी, और इसकी गलत कैसे कह दी? जब आप कंफ्यूज हो, तो आप चलोगे ही नहीं; (और) जब आप कंफ्यूज हो, तो कृष्ण को सही, उसको गलत कैसे माना — ये आपने कैसे कह दिया? क्या आधार है, क्या बेस? जब कंफ्यूज हो, तो सही-गलत का फैसला कैसे तुमने कर लिया? कंफ्यूज बंदा (फैसला) कैसे कर सकता है? (अगर फैसला कर लिया,) इसका मतलब आप कंफ्यूज नहीं हो। (तो पहले उस चीज को करके देखो, और जब रिजल्ट नहीं मिलता, तो फिर कोई और मिलेगा —) बात खत्म। (चलते रहना ऐसे ही —) तब तक, जब तक पहुंच ना (जाओ)। (मुझे लग रहा है ये बिना चले ही पहुंचना चाह रहा है —) कल्पना में। (ये) कंफ्यूज नहीं है, कंफ्यूज करना चाहते हैं सबको। पहले पूरी बात सुना कर। तेरे में एक बहुत बड़ी कमी है — (सामने वाले का) सेंटेंस पूरा नहीं होता, बस अपनी बात बोलने लगता है। सामने वाला कुछ कह रहा है — उसकी बात (पूरी होने दो); ये कमी तुम्हारे में बहुत है, शुरू से कर रहे हो। पहले आपने कुछ कहा, अब वो कह रहा है — उसकी बात तो खत्म होने दो, वो कुछ कहना चाहता है। बीच में ही बोल दोगे, तो उसकी बात कहां समझ (पाओगे)? पहले तो ये कमी तुम दूर करो — या तो फिर बातें करनी हैं, कंफ्यूज हो, और सबको कंफ्यूज करके निकल जाना है। (अब क्लेरिटी आई — पहले पूरी बात सुनना पड़ेगा —) हां, क्योंकि तुम बताने वाली जगह पे नहीं हो, आप पूछने वाली जगह पे हो। आपने पूछ लिया, तो पहले क्या बताया जा रहा है, उसे पहले पूरी तरह अनुसरण करो। अगर आपने किसी की बात को पढ़ा, और जब आप कृष्ण की बात को पढ़े, तो लगा कि उसकी बात गलत है — तो कंफ्यूजन तो यहां दूर हो गई; नहीं तो आप गलत-सही में जाते ही नहीं। अगर आप एक फैसले तक आ गए, इसका मतलब आप कंफ्यूज नहीं हो — तो फिर कृष्ण के बताए अनुसार चल दो, बात खत्म हो गई। कंफ्यूज कहां हो? अगर कंफ्यूजन होती, तो आप कहते — यार, ये कुछ और कह रहे हैं, कृष्ण भगवान कुछ और कह रहे हैं, मैं करूं क्या? (कंफ्यूज हो तो) आप सही-गलत पे कभी नहीं जाते; सही-गलत पे गए, इसका मतलब बात समझ में आ रही है। तो जिसकी (बात) समझ में आ जाए, (उसकी) लेके निकल, बस — यही बात खत्म।

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वीडियो: अगर भक्त न हो तो भगवान का क्या होगा ? क्या भगवान भक्त पर निर्भर हैं ? #bhakt #bhagvan · 2025-07-17