आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P3-0191 · भाग 3

(वही साधक) आपने बताया कि धारणा को भी तोड़ना है, ध्यान से भी मुक्त होना है — धारणा, ध्यान, फिर समाधि, फिर तुम, फिर ब्रह्म। तो समाधि वाली स्थिति में कैसे पहुंचा जा सकता है, वो कब आती है? कितने दिन बाद आती है, कितनी देर रहती है? आत्मज्ञान का अनुभव और समाधि का अनुभव — दोनों अलग होते हैं या एक ही? और समाधि में शरीर का भान रहता है या नहीं?

हां, पहले तो एक धारणा तोड़ने के लिए दूसरी धारणा बनानी पड़ेगी ना। तो धारणा, ध्यान, फिर ध्यान के बाद समाधि, फिर तुम, और फिर ब्रह्म — यही यात्रा है। (समाधि) तब आती है जब आपको कुछ नहीं चाहिए; वो तभी आएगी। क्योंकि कुछ चाहिए में तो ध्यान घटित होगा; अब कुछ नहीं चाहिए तो ध्यान किस पे करोगे? तो जब कुछ नहीं चाहिए, तो समाधि की स्थिति आएगी। वो कभी भी हो सकती है, कहीं भी हो सकती है। जैसे कोई मां बनने वाली हो, तो कहीं भी बन सकती है; ऐसा थोड़ी ना है कि कोई बाथरूम में नहा रहा है तो मां नहीं बन सकती — हो सकता है बाथरूम में नहाते-नहाते मां बन जाए; ट्रेन में सफर करते, कितने लोग प्लेन में मां बन गए। लेकिन उसके लिए गर्भधारण हुआ है, तभी; अब गर्भधारण नहीं हुआ, तो थोड़ी प्लेन में कोई मां बन जाएगा। लेकिन गर्भधारण हो गया, तो मां कभी भी बन जाएगी। (कितने दिन बाद —) कुछ बोला नहीं जा सकता। जैसे कोई मादा है, तो दर्द उठता है, मां बन जाती है; किसी-किसी को घंटों होता है, किसी को दो दिन हो, किसी को महीना हो। कोई दो-चार महीने समाधि में रहे; लेकिन आप यह मत समझना कि आंख बंद करके ऐसे बैठा है — चलता-फिरता, बोलता (है), अलग सा ही अनुभव है। (आत्मज्ञान और समाधि —) अलग ही होता है। समाधि में वो कुछ नहीं चाहिए में आ जाता है, लेकिन उसको ज्ञान नहीं रहता। जैसे एक स्त्री ने गर्भ को धारण कर लिया, लेकिन दूध कब आएगा? जब बच्चे का जन्म होगा; जन्म होते ही स्तन से दूध आ जाएगा; जन्म के एक दिन पहले भी दूध निकालो तो नहीं निकलेगा। (जबरदस्ती निकालो तो जो आता है) वो पूर्ण दूध नहीं है, समाज के किसी काम का नहीं है; उसको दूध भी नहीं बोल सकते — मैं पूर्णता की बात कर रहा हूं। तो ऐसे ही, जब हम पूरी तरह निर्विकार हो जाएंगे, तब समाधि में हो जाएंगे; और आत्मज्ञान हो जाएगा तो फिर उसके बाद वही ज्ञान निकलेगा। दोनों का अनुभव अलग-अलग है। समाधि में ये होता है कि अब कुछ नहीं चाहिए में आ जाता है, लेकिन ज्ञान नहीं रहता, उसे अभी ज्ञान नहीं हुआ है — अब वो चाहे एक दिन लग जाए, चाहे कई दिन लग जाएं। मैं कई महीने तक था — अगर मैं अपने आप को देखता हूं तो (जनवरी तक)। उसको करने के लिए अब बाहर कुछ नहीं; यहां तक कि आत्मज्ञान की भी इच्छा हट जाती है। वो अपने आप में हो जाता है; उसकी कोई इच्छा नहीं है कि भ्रमण करो। आत्मज्ञान की भी इच्छा खत्म हो जाती है — वो इसलिए कि भैया, मैंने अपने करने से सब कुछ कर लिया। मैं आखिरी स्थिति अपनी बता रहा हूं — वो इतना थक जाता है कि अब किसके पास जाऊं, वो भी खत्म हो गया है, और मेरी ताकत भी खत्म हो गई है; ना करने को कुछ बकाया है, और मैं करने लायक भी नहीं हूं। ना तो कुछ करने के लिए बाहर है, और ना तो मैं उस लायक हूं — दोनों स्थिति नहीं है। उसको पता चल गया, तभी तो वो खत्म होता है, तभी तो खोजी खत्म होता है। क्योंकि खोजी पैदा कैसे हुआ? कुछ करने में, कुछ जानने में, कुछ समझने में खोजी का जन्म हुआ। तो जैसे ही उसे समझ में आता है कि यार, अब समझने के लिए तो कुछ नहीं है, जितना समझना था मैंने प्रयास कर लिया, अब मेरे करने में कुछ नहीं होगा, करने से जितना होना था हो गया, कुछ नहीं हुआ, इतने सालों से कर रहा हूं — तो पहले खोज खत्म होती है, फिर खोजी खत्म होता है, और फिर जो शेष बचता है वो समाधि में चला जाता है। (समाधि पांच मिनट, दस मिनट या महीनों —) कुछ बोल नहीं सकते, उसका कोई टाइम मैं नहीं दे सकता आपको। जैसे एक आदमी कोमा में चला जाए, तो क्या डॉक्टर टाइम दे सकता है कि कब निकलेगा? हो सकता है अगले मिनट निकल जाए, हो सकता है कई साल ना निकले। समाधि का कुछ बोल नहीं सकते कि समाधि लगने के बाद आप कब निकलोगे, कब आत्मज्ञान होगा; लेकिन समाधि के बाद हो जाता है। लेकिन समाधि भी कोई ऐसे ना सोचे कि भैया, लग गई मेरी। जब तक इच्छाएं हैं, या करने लायक आप कुछ हो, तो (वह) समाधि नहीं है। ये तो नहीं कि थक के बैठ जाए और बोले भैया, समाधि में हूं; ऐसा नहीं है — बेवकूफ बना के बैठ जाए कि यार, मैं करने लायक नहीं — नहीं चलेगा। (शरीर का भान —) रहता है; वो खाता भी है। अगर शरीर का भान नहीं होता तो भोजन कैसे ग्रहण करता? किताबों से निकलिए जरा। जैसे दारू पीने वाले को कहते हैं कि दारू पी लिया, अब इसको कुछ (पता नहीं) — अरे, उसे सब पता है। उसे मारो तो तुम्हें मारता है; उसे पता है ना कि मुझे चोट लग रही है। अगर उसे कुछ नहीं पता है, तो दर्द भी नहीं होता, सामने वाला मारता है तो वो अपने आप में ही रहता। अगर वो शरीर से कोई विरोध कर रहा है, तो इसका मतलब पता है; पता नहीं होता तो विरोध नहीं करता। जब कोई भी विरोध करे, तो समझ लेना इसे पता है — विरोधी तब पैदा हुआ जब उसके अनुसार नहीं हो रहा, इसलिए वो विरोध कर रहा है। समाधि पे वीडियो भी बनाई है, उसे देखना।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 1 मार्च 2026 #योगी · 2026-03-01