प्रश्नोत्तर P3-0185 · भाग 3
(कुटिया में साधिका) आप कहते हैं कि मुझे यहां तक लाने में अनेक लोगों का बल लगा है। पर मुझे लगता है कि मैं अपनी इच्छा-वासनाओं के कारण खुद ही उनमें घुसी हूं — वे लोग तो सिर्फ उपकरण थे, किसी ने मुझे जबरदस्ती नहीं फंसाया। अगर मैं यह कहूं कि इन लोगों ने मुझे फंसाया, तो मेरी लायबिलिटी कम हो जाती है; अगर पूरी लायबिलिटी खुद पर लूं तो मैं अपने ऊपर ज्यादा काम कर पाऊंगी। और घुसने में मैंने अपनी पूरी ताकत लगा दी, अब मैं निष्क्रिय हो गई हूं, मुझमें दमखम नहीं — अब निकलूं कैसे? क्या यह सोच सही नहीं है?
अगर वो एंट्री नहीं देते तो आप नहीं घुस पाते। उसको मेरे से कुछ चाहिए और मुझे उससे कुछ चाहिए — तो यह कॉन्ट्रैक्ट तो उसी टाइम पक्का हो जाता है। आप यहां हो, अनेक लोगों में हो, तो अनेक लोग मिले हैं ना।
शुरुआत मुझसे हुई, लेकिन सहयोग मुझे सामने से मिला। अगर सहयोग सामने से नहीं मिलेगा तो आप फंस ही नहीं सकते। तो फंसने को बहुत ईमानदारी से स्वीकार करना पड़ेगा। अगर आपने सीधा ये भी स्वीकार कर लिया कि नहीं, मेरे फंसाने में सिर्फ मेरा हाथ था और किसी का नहीं था — तो इसमें अहम भाव आ जाएगा, फिर निकालने के लिए (सहायता) नहीं ढूंढोगे। आप इसे बहुत गहराई से समझो — जब होगा कि मैंने ही फंसाया है, यह पूरी तरह पक्का है, (तो सोचोगे) फिर मैं (खुद ही) निकाल लूंगा।
(ताकत खत्म हो गई —) ऐसा हो ही नहीं सकता; ये आप कह रहे हो ना, ऐसा है ही नहीं। अगर मैं फंसा, तो इच्छा मेरी जागृत हुई; बेईमानी करने के लिए मैं तैयार हुआ, तब मुझे बेईमानी कराने वाले लोग मिले। अगर मैं तैयार भी हो जाता और लोग नहीं मिलते, तो मैं कर ही नहीं पाता। कोई ना कोई हमारे कार्य में निमित्त बना — इसे भी स्वीकार करना पड़ेगा। मुझे पता है कि इससे मेरी इच्छा पूरी होगी, तो उसको भी तो पता है कि मेरे से उसकी इच्छा पूरी होगी, तभी तो कॉन्ट्रैक्ट बनता है। तो इसे स्वीकार करना पड़ेगा कि हम एक-दूसरे के पूरक हैं। हम जहां भी हैं, किसी के सहयोग से ही हैं; और हम वहां से निकल सकते हैं तो उसमें भी किसी का सहयोग लेना पड़ेगा। इच्छा हमारी, सहयोग किसी और का। अगर सहयोग मुझे नहीं मिलता तो मैं वहां नहीं पहुंच पाता; अगर मैं इच्छा भी रखता और सहयोग ही ना मिलता, तो हमारी इच्छा ही रह जाती। यही तो कहा जा रहा है कि हमारे फंसने में भी किसी का सहयोग है।
मेरी इच्छा का सहयोग भी हो जाए, और कोई मुझे सामने से स्वीकार ना करे, तो मैं नहीं फंस सकता। (एआई से बनी बॉडी से भी लोग इच्छाएं पूरी कर रहे हैं —) नकली का यूज़ इसलिए होता है कि असली भी मौजूद है; असली के बारे में उसे जानकारी है, तभी वो नकली को यूज़ कर पा रहा है। मेरा यही कहना है कि अगर मैं फंसा, तो शुरुआत मुझसे हुई, लेकिन सहयोग बहुत लोगों का है; तो अब मैं अकेला चाहूं तो नहीं निकल सकता, क्योंकि सहयोग बहुत लोगों का है, बहुत बल लगा है। फंसने में भी हाथ लगा है; अगर फंसने में हाथ ना लगे तो फंस ही नहीं सकते — उसको क्यों नहीं समझ रहे हो? आप फंसने के लिए तैयार हो और दूसरा फंसने के लिए तैयार ना हो, तो क्या आप फंस सकते हो?
और आपकी इच्छा ऐसे हो ही नहीं सकती। आपने कुछ देखा, तभी इच्छा जागृत हुई। बिना उस जानकारी के इच्छा जागृत ही नहीं हो सकती; आपको जानकारी दी गई। जहां आप फंसने जा रहे हो, उस फंसने के पहले ही उसके बारे में पूरी जानकारी है, तभी तो इच्छा जगी। अगर जानकारी का अभाव होता तो इच्छा भी नहीं जगती; आप उसे देखते रहते कि क्या है। यह कहीं से पता चला, तब जाकर लगा कि चलो, ले लें। इच्छा आपसे नहीं — शुरुआत बाहर से है।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 1 मार्च 2026 #योगी · 2026-03-01