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प्रश्नोत्तर P3-0178 · भाग 3

(कुटिया में, 62 वर्षीय साधक) 30-40 साल पूजा-पाठ किया — रोज हनुमान चालीसा, दुर्गा सप्तशती, काली स्तोत्र, चारों धाम घूमा — पर कुछ नहीं मिला। तांत्रिक लाखों रुपए खा गए, कोई झगड़े नहीं सुलझा पाया; 15-20 लाख का कर्जा है, केस चल रहे हैं, बहुओं वाले झगड़ों से घर बिखर गया। हमने जीवन में किसी का बुरा नहीं किया, किसी को परेशान नहीं किया — फिर हमारे साथ ऐसा क्यों हुआ? पत्नी ने ही धक्का देकर यहां भेजा है।

अब जितना भी जीवन बचा है — बात भी समझ में आ गई है — अब अपना कल्याण कर लो। अब लग जाओ अपने कल्याण में; जितना जीवन बचा है, जितना समय बचा है, अपने कल्याण में लगा दो। अगर मेरे साथ कुछ हो रहा है तो उसका जिम्मेदार मैं हूं। बहुत दुख है — पता नहीं, उस दुख के पीछे कहीं ना कहीं मैं ही हूं। तो आप बस अपने कल्याण में अब लग जाओ। उस दुख के पीछे, चाहे उस सुख के पीछे, मैं ही था; उसका जिम्मेदार सिर्फ मैं हूं। और जितना कर सकते हो आप करो, और निकाल लो अपने आप को। अगर मेरे साथ कुछ हो रहा है तो उसका जिम्मेदार एक ही व्यक्ति है — वो सिर्फ मैं हूं, चाहे वो सुख हो चाहे दुख हो। मेरे किए गए कर्मों का परिणाम है, और वो मेरे द्वारा ही मिला है। स्वीकार भाव रखते हुए जितना कर सकते हो करो; निकालो अपने आप को। इस भवसागर से निकालना ही बुद्धिमानी है। और कोई भी ऑप्शन अपनाओगे तो फंस जाओगे। सीधा स्वीकार करो कि मेरे साथ कुछ हो रहा है तो उसका जिम्मेदार एक ही व्यक्ति है, वो मैं हूं, और मैं अब निकलना चाहता हूं। बस, इसके आगे जरा सा भी आप बुद्धि लगाओ तो तुम फिर फंसे, क्योंकि बदले का भाव आएगा कि मैंने नहीं किया, इसने किया; इसने क्यों किया, मैंने तो नहीं किया। तो बदले का भाव आ जाएगा, और वो बदला — पता नहीं वो कौन सा शरीर धारण करेगा, तुम कौन सा करोगे। इसलिए बुद्धिमानी यही है, समझदारी यही है कि अगर मेरे साथ कुछ हो रहा है, और आगे भी कुछ होगा, तो इसका जिम्मेदार मैं हूं; मैं इसे स्वीकार करता हूं, और मेरा भाव बस इतना है कि मैं अब निकलना चाहता हूं। इस पर प्रबल इच्छा बना लो कि बस एक ही बात है — मुझे निकलना है। यहां कोई दोषी नहीं है। अगर कोई दोषी है भी — चाहे वो सही हो चाहे गलत — यह देखने का अधिकार जिसकी दुनिया है वह जाने। मेरी दुनिया तो नहीं है, मेरी बनाई हुई दुनिया नहीं है। वो चाहे अच्छा हो चाहे बुरा, दोनों को उसने स्वीकार किया है, तभी तो दोनों मौजूद हैं। तो मैं अस्वीकार करने वाला कौन होता हूं? मैं अगर अपने आप को देखूं तो मैं एक सामान्य नागरिक हूं और मैं निकलना चाहता हूं। ना मैं उस पद पर हूं कि मैं उसे सुधारूं, मेरा अधिकार भी नहीं है। तो मैं सुधार तो नहीं सकता, लेकिन उसमें दोष क्यों देखूं? मैं बदल भी तो नहीं सकता — तो मैं दोष देख के फंसूं क्यों? जब मैं कुछ कर ही नहीं सकता, तो मुझे कुछ बोलने का भी अधिकार नहीं है; जब मैं बदल ही नहीं सकता, और यह अधिकार मुझे कहीं से नहीं मिला है। अगर मैं अपने आप को एक जगह खड़ा कर दूं और देखूं कि मेरा अधिकार कहां रहता है, तो मैं अधिकार से ज्यादा जाऊं ही क्यों? तो अगर हम देखेंगे तो मेरा अधिकार बस इतना है — जितना जीवन बचा है, अपने आप को निकालने में लगा दो। और जितना आपके साथ हुआ, आप ये स्वीकार करो कि कहीं ना कहीं तो आपने किया था। अगर मेरे साथ कहीं कुछ हो रहा है तो उसका जिम्मेदार मैं हूं, और उसके लिए कभी ना कभी मैंने काम किया था, तभी हो रहा है; नहीं तो हो ही नहीं सकता। मैंने आज नहीं किया है, बीते हुए कल का याद नहीं आ रहा है, लेकिन कहीं ना कहीं तो मैंने किया है, नहीं तो हो ही नहीं सकता। और अब मुझे निकलना है, तो बदले का भाव छोड़ो। नहीं तो बदले का भाव रखोगे — कि मैंने तो नहीं किया, यह क्यों हुआ — इसका मतलब अब आप आगे की तैयारी कर रहे हो, उस व्यक्ति से आगे भी मिलना है। अभी वो आपके जीवन में नहीं है, पता नहीं वो कहां है, लेकिन आगे मिलने की तैयारी कर रहे हो। इसीलिए स्वीकार करो और बस निकलने के लिए तैयार हो जाओ कि बस समझ में आ गया, कुछ नहीं है; बस मैं किसी तरीके से अपने आप को निकाल लूं।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 1 मार्च 2026 #योगी · 2026-03-01