आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P3-0174 · भाग 3

(कुटिया में, इंदौर से आए 75 वर्षीय साधक) मैं पहले भी अध्यात्म में बहुत चला — साधना करो, यज्ञ-हवन करो, साधना से प्रकाश आएगा, भगवान का दर्शन होगा — पर समझ नहीं आया। 13 दिन से आपके वीडियो दिन-रात सुनकर समझ आया कि प्रत्यक्ष ज्ञान में चार-पांच ही बातें हैं; मैं करूंगा तभी होगा, किसी और के करने से नहीं; मैं ही हूं, कहां जाऊं। इसलिए घर से रोटी बांधकर सीधा चला आया। अंतिम इच्छा यही है कि आप रखो तो यहीं रह जाऊं। गुरुदेव, इससे आगे क्या है?

अब समझ में आ गया तो अपना कल्याण कर लो। ऐसा ना हो कि प्रयास में ही जिंदगी चली जाए। अब वो रास्ता मिल गया — तो क्या थोड़ा प्रयास करके रास्ता और ढूंढेंगे, कल देखेंगे? इसके आगे क्या है — आगे नहीं जाना है, तो बस वापस अपने में आ जाना है। कहीं नहीं जाना; अपने आप में स्थिर होना है। कोई भी कामना रखेंगे तो कहीं ना कहीं हम बाहर ही हैं। और जब तक हम प्रकाश की इच्छा रखेंगे, तो प्रकाश जहां से होगा वो अलग है, प्रकाश अलग है, मैं अलग हूं — ऐसे भ्रमित रहोगे। बस कैसे भी अपना कल्याण करो। सात दिन तो रुकना ही अनिवार्य है। 7 दिन के बाद भी अब फैसला करो कि कहां रहना उचित है — यहां कि वहां; मेरा कल्याण कहां होगा। व्यवस्था को मत देखो, मुंह को मत देखो, लोगों को मत देखना। अब यह देखो कि मेरा कल्याण कहां से होगा। तो बस जहां से कल्याण हो जाए, वहीं रुक जाओ।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 1 मार्च 2026 #योगी · 2026-03-01