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प्रश्नोत्तर P3-0153 · भाग 3

जब सब तुम में ही है तो क्या चाहिए? अगर मैं सीधा अपने आप में आ सकता हूं तो इतनी विधियां क्यों? और एक व्यक्ति रोज दो घंटे ध्यान-पूजा-पाठ करता है, दूसरा ईमानदारी से कर्म करते हुए वे दो घंटे जरूरतमंद की सेवा में लगाता है — दोनों ईमानदार हैं, तो पहले कौन पहुंचेगा?

कुछ नहीं चाहिए। अगर मैं सीधा अपने आप में हो सकता हूं, यह मेरी क्षमता है, तो मुझे विधियों की जरूरत नहीं है — यह आपको देखना है। आना तो आपको यहीं है; विधियां भी छूटेंगी। मैं आपको कह रहा हूं, आप यह ध्यान कर रहे हो, यह भी छूटेगा, तभी उपलब्धि होगी — चाहे ध्यान हो, चाहे भक्ति, चाहे योग, चाहे ज्ञान — ये सब छूटेगा तभी उपलब्धि होगी। और आना यही है — ईमानदारी-सत्कर्म में आखिर में पकता है। तो सीधा पक जाओ, धीरे-धीरे क्यों? अगर हमें सीधा पकने का उपाय मिल गया है तो हम सीधा क्यों न पक जाएं? मान लीजिए कहीं जाना है — वहां पैदल भी जा सकते हैं, टैक्सी से भी, खुद की गाड़ी से भी, फ्लाइट से भी, और मैं सामर्थ्यवान हूं, तो मैं फ्लाइट का ही चुनाव करूंगा। तो अगर आपको सीधा मिल गया कि उम्मीद छोड़ दो — बस, तो उम्मीद छोड़ने के लिए काम करो; कहां उम्मीद लगी है, उसे छोड़ो; ईमानदारी-सत्कर्म अपना लो, बात खत्म। अपनी सामर्थ्य देख लो। हमने तो आपको बता दिया कि आप किसी भी मार्ग से जा सकते हो, सहायक हो जाएगा — ईमानदारी-सत्कर्म जरूर अपना लेना; मैंने तो आपको मेन टिकट दे दिया। जैसे ट्रेन का एक सुपरफास्ट टिकट होता है जिससे किसी भी ट्रेन में चढ़ सकते हो — हम तो आपको ऐसा टिकट दे रहे हैं जो दुनिया में जितने साधन बने हैं, सब में चलेगा, प्लेन में भी — नेशनल परमिट, यूनिवर्सल। और अगर यह टिकट आपने नहीं लिया तो हर गाड़ी से उतार दिए जाओगे। वही परमिट दिलाने आया हूं — ले लो, निकल लो। और यह तो सीधा आपके हाथ में है। एक व्यक्ति एक-दो घंटे ध्यान, पूजा या पाठ करता है, और एक व्यक्ति ईमानदारी से कर्म करते हुए जो एक-दो घंटे का समय मिलता है, उसे जरूरतमंद की सेवा में लगाता है — आप बताइए कौन पहुंचेगा? सेवा करने वाला। ऐसा नहीं कि ध्यान करने वाला नहीं पहुंचेगा, वह भी पहुंचेगा, लेकिन सेवा करने वाला जल्दी पहुंच जाएगा। इसलिए कहता हूं समय नहीं है — समय के पार की यात्रा है, निकल लो, विलंब मत करो; यह टिकट लो, जहां जाना है बैठ जाओ।

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