प्रश्नोत्तर P3-0134 · भाग 3
गुरुदेव, मां-बाप की करोड़ों की स्टेट बच्चों को मिलती है — उसका क्या? और समझ तो अभी आई है, बदलाव अभी कर रहे हैं, पर परिवार ने पहले के हिसाब से इच्छाएं पाल ली हैं और कहते हैं ऐसा तो हो ही नहीं सकता — तो क्या करें?
अगर योग्यता से ज्यादा हो गई तो पतन कर देगा, गंवा देगा; अगर योग्यता में रहा, संभालने की योग्यता रही, तो संभाल लेगा, नहीं तो पतन कर देगा।
वे कहेंगे — पहले तो तुम ऐसे नहीं थे; ऐसा ही था तो पहले बता देते। ठीक है, आप पहले नहीं बता पाए, अब तो बता रहे हो। वे बोलेंगे अब हमने तो उस हिसाब से इच्छा पाल ली थी — कोई बात नहीं, तो जरूरत में देना चालू करो, सिर्फ जरूरत में। वे कहें ऐसा तो हो ही नहीं सकता, तो ऐसा भी नहीं हो सकता — जाओ। जवानी में शादी के समय प्रॉमिस बहुत दिए जाते हैं, लेकिन सभी को थोड़े ही पालना होता है।
मैं ऐसा हूं, और मैं इतना कर सकता हूं — सीधी, साफ-सुथरी बात। आज तक मैंने अपने जीवन में कभी किसी को रोका नहीं; समय ने मिलाया, कुछ लेनदेन था, हिसाब हुआ, जाओ। मेरे पास यह है — पसंद है तो ठीक, नहीं तो कोई बात नहीं; आपको यह दे सकता हूं, चाहिए तो ठीक, नहीं तो जाओ। हम आपके लिए बेईमानी क्यों करें? नहीं करेंगे। तुम मेरे साथ रहो चाहे छोड़ो, लेकिन मैं अपने आप को नहीं छोड़ूंगा; मेरे साथ रहना है तो मैं ईमानदारी में रहूंगा। जरूरत में जियो। तुम्हारी जरूरत है भोजन, कपड़ा, मकान — उससे ज्यादा सोसाइटी मेंटेन नहीं करूंगा। हमारी कमाई इतनी है तो हम उसी में, झोपड़ी में चलकर रहेंगे; चलना है तो चलो, नहीं तो ठीक है। उन्होंने भी तो प्रॉमिस दिया था कि तुम जहां चलोगे वे तुम्हारे पीछे-पीछे चलेंगी — वह भी तो याद दिलाओ; सात वचन अकेले तुमने ही थोड़े लिए थे, सात जन्म का ठेका उनका भी था।
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