प्रश्नोत्तर P3-0098 · भाग 3
कर्म योनि और भोग योनि क्या है? मानव शरीर और अन्य जीवों के शरीर में क्या अंतर है?
मानव शरीर के अलावा जितने हैं वे भोग योनि हैं। उन्हें भोग और भोजन — वह भी प्राकृतिक। उनका भोग का समय होता है, वे जब चाहें तब भोग नहीं कर सकते; और भोजन भूख लगने पर अपना खाते हैं। वह भोग योनि है। मानव शरीर कर्म योनि है। मानव शरीर में तीन प्रवृत्तियां दी गई हैं — सात्विक, तामसी, राजसी। बाकी जितने अन्य जीव हैं, उन्हें अपने स्वभाव से ही शरीर मिलता है — शाकाहारी है तो शाकाहारी, मांसाहारी है तो मांसाहारी; उनमें सात्विक-तामसी-राजसी गुण नहीं हैं, वे न पाप करते हैं न पुण्य, न अच्छे हैं न बुरे। हर मानव के अंदर समझ है — अबोध की बात मैं नहीं कर रहा — और यह कर्म का शरीर है, इसमें कर्ता का अधिकार है। इसमें भोग, भोजन और योग है; योग हर शरीर में नहीं, इसी शरीर में योग करके अपने आप को साधना है।
मानव शरीर को स्वतंत्रता दी गई है कि वह जब चाहे भोग कर सकता है, उसे प्रकृति के हिसाब से नहीं चलना — बारिश हो, ठंड हो, जैसा माहौल हो; और भोजन जब चाहे कर सकता है। शरीर को पूरी छूट दी गई है, लेकिन जब तक योग बाकी है तभी तक आप इस शरीर में हो। जिस दिन योग खत्म हो जाएगा, आपको भोग योनि मिल जाएगी। अगर आपने इस शरीर का सिर्फ भोग-भोजन में उपयोग किया — जितने भी अन्य जीव हैं वे भी हर साल बच्चों को जन्म देते हैं, घोंसला बनाते हैं, पालते-पोसते हैं, बड़ा करते हैं, छोड़ देते हैं — अगर इतना ही काम आपने किया तो आपने पशुओं की तरह जीवन जिया। तो जब आपका योग का समय खत्म हो जाएगा, वह आपसे छीन लिया जाएगा और आपको भोग शरीर मिल जाएगा — क्योंकि आपको भोग-भोजन ही करना था, तो फ्री में करिए। मानव शरीर में ही व्यक्ति पैदा करके खाता है, बाकी जीव पैदा नहीं करते। योग बाकी रहा तो अगला शरीर मानव का मिलेगा; योग खत्म हो गया तो अगला शरीर भोग-भोजन का मिल जाएगा — मानव शरीर लेकर करोगे क्या, जब योग करना ही नहीं है?
आप मानव नहीं हो, यह बात समझ लेना। वही विद्युत पंखे में गई तो पंखा नाच रहा है, वही बल्ब में गई तो उजाला दे रही है; जगह बदल दो तो वह नाचने लगेगी, वह उजाला देगी। हम जिस शरीर में जाएंगे वैसा बर्ताव करने लगेंगे। अभी मानव शरीर मिला है, समझ भी है — सौभाग्यशाली हो। मैं दुनिया का सौभाग्यशाली उन्हें समझता हूं जो अध्यात्म समझते हैं, और दुर्भाग्यशाली उसे जो समझने के बाद भी यात्रा नहीं कर रहे। दुनिया में ऐसे समझ वाले हैं जिन्हें अध्यात्म समझ में ही नहीं आता — हो सकता है परिवार-रिश्तेदार में हों, मां-बाप ही हों। कितने महापुरुष हुए, उनके मां-बाप अध्यात्म को नहीं समझे; उपलब्धि के बाद भी बोले — आओ, अभी भी राज संभाल लो।
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