आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P21-0105 · भाग 21

गुरु जी, पहले हम मानते थे कि ज्ञान की सेवा सबसे बड़ी है; फिर आपसे सुना "बिना दया के ज्ञान कसाई", तो सेवा-भंडारा करने लगे; भंडारे के बारे में लिखा तो आपने कहा ज्ञान का भंडारा करो — अब मैं कंफ्यूज हूं, क्या करूं?

मेरा कहना था कि जब गोयल जी ने सत्संग कराया तो तुम्हें लाभ हुआ; तो तू सत्संग ही करवा देता तो कई और लोगों को लाभ मिलता — जैसे आज इन्होंने सत्संग कराया तो अनेकों लोग लाभ ले रहे हैं। आप भोजन कराओ, लेकिन जरूरतमंद हो; और उसके साथ देखिए आप और क्या-क्या कर सकते हो, वो भी करो — आपकी क्षमता उसकी भी है, इसकी भी, तो इसके लिए क्यों नहीं सोच रहे? शब्दों से जुड़ो, किसी शरीर से ना जुड़ो; गुरु ज्ञान का प्रतीक है, ज्ञान लो, आगे बढ़ो — ज्ञान कभी धोखा नहीं देता, ज्ञान से ही आपका कल्याण होगा, रूप-रंग-आवरण से नहीं। अपनी पूरी क्षमता लगा दो। किसी को भोजन कराया और उसे बिस्तर की जरूरत है तो बिस्तर भी दो — ऐसा ना हो कि हम तो भोजन ही कराएंगे। देखिए सामने जरूरत क्या है, सूझबूझ के साथ चलना होगा।

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