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प्रश्नोत्तर P21-0079 · भाग 21

गुरु जी, आत्मज्ञान के लिए दृढ़ निश्चय के लक्षण क्या हैं — कि मुझे आत्मज्ञान ही चाहिए?

आप जहां भी समय दोगे, आत्मज्ञान कैसे हो जाए उसके लिए दोगे; और किसी के लिए समय ही नहीं दोगे। अगर और किसी रस के चक्कर में समय दे रहे हो, इसका मतलब आत्मज्ञान पक्का नहीं। मैं ओंकारेश्वर में एक आश्रम में गया; कोठारी ने कहा खा लो, आराम से रहो, महाराज अभी नहीं हैं। मैंने कहा मैं यहां खाने-पीने तो आया नहीं, जब जवाब मिलना ही नहीं तो शरीर के लिए क्यों रुकूं — और रात भर ठंड में नर्मदा तट पर बिना बिस्तर के सोया। अगर उस रात वहां रुक जाता तो मेरे लिए आत्मज्ञान जरूरी नहीं था। एक महात्मा ने कहा तुम्हें पूरे भारत में आत्मज्ञान नहीं मिलेगा — मैंने कहा भारत में तो आप भी हो, और जेब में एक पैसा नहीं था, फिर भी उसी शाम नौ किलोमीटर पैदल चल दिया। आत्मज्ञान पक्का होगा तो जहां आत्मज्ञान की संभावना रहेगी वहीं रहोगे, नहीं तो रुकोगे ही नहीं; और ये स्थिति नहीं है तो आत्मज्ञान के बहाने बहुत कुछ चाहिए। ये स्वयं की चेकिंग है — कहीं मैं ऐसी जगह समय तो नहीं बिता रहा जहां आत्मज्ञान की कोई बात ही नहीं, या किसी और की भूख मिटाने के बहाने अपनी भूख मिटा रहा हूं। अगर आपके खाने-पीने-सोने का समय निश्चित है, सारी व्यवस्था करके रखी है और कहते हो जो मिल जाए हम तो फक्कड़ हैं — ये चालाकी है। 12 साल में आज तक मुझे नहीं पता मैं कब सोऊंगा, कब खाऊंगा, यहां के बाद कहां जाऊंगा। अगर आप समय में जी रहे हो तो आत्मज्ञान कभी नहीं होगा; समय के पार जी रहे हो तो आत्मज्ञान दूर नहीं — जहां मन-बुद्धि नहीं, वहां समय भी नहीं।

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