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प्रश्नोत्तर P21-0062 · भाग 21

गुरु जी, बुद्ध ने कहा कुछ चीजें बिना भोगे बोध से भी समझ आती हैं। अगर इस मार्ग में सबके साथ यही हो रहा है, तो इससे अच्छा क्या यह नहीं कि संसार की जिम्मेदारी छोड़कर गुरु से ही जूते खा लें?

गुरु जूता मारता नहीं; गुरु तो तुम्हारे लिए जूता खा सकता है, तुम्हें जूतों से मुक्त करेगा। यहां का जूता गिराएगा, वहां का जूता उठाएगा — लेकिन गुरु तुम्हें जूता नहीं मारता। मां तुम्हें ज्यादा भोजन देती है, गुरु कम देता है, क्योंकि मां तुम्हारे शरीर का उपयोग करना चाहती है और गुरु शरीर को छोड़कर तुमको देख रहा है — कि तुम इस शरीर से कैसे छुटकारा पाओ। गुरु के पास अथाह भोजन है, फिर भी वो कम देता है। गुरु कभी जूते नहीं मांगता; गुरु तो तुम्हारे लिए कितने जूते खाकर गुरु बना — गुरु पद ऐसे ही थोड़ी मिलता है। मैं अपनी बीती कहानी इसलिए बता रहा हूं कि तुम्हारे साथ भी होगा — घबराना मत; तरीका अलग होगा।

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