प्रश्नोत्तर P21-0049 · भाग 21
गुरु जी, मैं जामनेर (महाराष्ट्र) से हूं; अपने गुरु जी के परमधाम जाने के बाद सत्संग में रुचि बढ़ी और YouTube से आपका पता मिला — अब आगे क्या करूं, सत्संग में कैसे जियूं?
सत्संग सुनिए और उसमें जियो, शब्दों में जियो — नहीं तो कोई मतलब नहीं। जैसे घर में हम अनाज बहुत इकट्ठा कर लें लेकिन उसे पका के खाएं नहीं तो वह शरीर को पोषण नहीं देगा, वैसे ही सत्संग में जो शब्द हैं उनकी गहराई में जाना चाहिए। सत्संग का मतलब सीधा-सीधा अपने आप को सुधारना। पहले तो पता करना पड़ेगा हम बिगड़े कहां हैं — मशीन बिगड़ी कहां है अगर नहीं खोज पाओगे तो उसे बना नहीं पाओगे। आज पहले से बहुत ज्यादा मेरे पास है, फिर भी जीवन अशांत क्यों? क्योंकि व्यवस्थाएं जुटाने में हम अपने को और अपनों को समय नहीं दे पाए, वस्तुओं को ज्यादा प्रधानता दे दी। पहले स्वीकार करना पड़ेगा कि मैं बिगड़ चुका हूं; सत्संग की शुरुआत ही है मान की इच्छा का त्याग करना। संसाधन अगर आप जुटा रहे हो तो उसमें पूरी ईमानदारी हो, नहीं तो वही संसाधन आपको घुटन देगा। लोग कहते हैं ऊपरी कमाई के बिना चलेगा नहीं — लेकिन वह एक बेईमानी है, आप किसी का हिस्सा ले रहे हो, और जब अनेकों का अभिशाप एक घर में लगेगा तो वह घर शांति में कैसे जिएगा? करोड़ों की कार में शांति नहीं लगी क्योंकि वो बेईमानी का था। इसलिए पहले तो पूरी तरह ईमानदार हो जाइए, अध्यात्म की शुरुआत ही यहीं से है — ईमानदारी मुक्ति है, बेईमानी बंधन। आप चाहे किसी विधि से जाओ, सब छोड़ के आखिरी में ईमानदारी पर आना ही पड़ेगा, तभी यात्रा की शुरुआत होगी। अपने आप से पूरी तरह ईमानदारी रखो — अंतरात्मा कहता है यह मत करो, गलत है, लेकिन फिर भी वासनाओं, कामनाओं, लालच और मान के चक्कर में दबा के करते हैं। कैसे भी अपने आप को निर्विकार कराओ: अपने आप में बैठो, अपने आप को जांचो, दृष्टा भाव से देखो कहां-कहां मैं फंसा हूं।
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वीडियो: कैसे भी अपने आप को निर्विकार कराओ ? #योगी · 2026-06-30