आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P18-0087 · भाग 18

गुरु जी, मन भटकता रहता है — क्या कल्पना करना और फिर उस कल्पना को बार-बार देखकर सही निर्णय लेना ही ध्यान है?

मन नहीं भटकाता, आपकी जरूरत भटकाती है — यही समझना है। क्या मोबाइल या कंप्यूटर ने कभी कहा कि यह वीडियो देखो? आप जहां-जहां ले जाते हो, वह खोल देता है। मन आपकी जरूरत को इंगित करता है; मन शरीर के लिए काम करता है, आपके लिए नहीं। एक ध्यान तो स्वतः घटित हो रहा है — यह बाहर का ध्यान है, इससे मुक्त होना है। जब आप "चाहिए" में या "अपने तरीके से चाहिए" में कुछ कर रहे हो, तो ध्यान बाहर अनेक वस्तुओं और लोगों पर जाता है — देखो क्यों जा रहा है, क्या चाहिए, लेकर क्या करोगे, जीवन में उसका सदुपयोग है या दुरुपयोग; उचित है तो लो, अनुचित है तो त्याग करो — यह ध्यान में ध्यान है। यह करते-करते जिस दिन राग-द्वेष से अपने आप को छुड़ा लोगे, उस दिन करने वाला ध्यान भी खत्म, करने वाला भी खत्म, जिसे चाहिए वह भी खत्म — आप "कुछ नहीं चाहिए" में आ जाओगे। तब अंदर से प्रेम पैदा होगा, अलगाव खत्म होगा, आप विराट स्वरूप के साथ हो जाओगे; फिर सत्य तक पहुंचोगे, उसके बाद आत्मज्ञान होगा, और आत्मज्ञान के बाद परम ध्यान घटित होगा — इसे एकाकार होना कहते हैं। और सत्संग कभी रिपीट नहीं होता — दोबारा कहूं तो अलग शब्दों और अलग भाव से आएगा — इसलिए इसमें पूरी तरह होकर सुनना चाहिए।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: आत्मज्ञान किस स्थिति में होता है ? #aadhyatmik_satsang #livesatsang #yogijikasatsang #pratyakshgyan · 2025-01-03