आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P18-0033 · भाग 18

गुरु जी, आपने सीधा रास्ता बताया कि "कुछ नहीं चाहिए" — डिजायर खत्म कर दें। क्या 55-60 की मेरी उम्र में भी यह ठीक रहेगा? और यह होगा कैसे?

हां, ठीक रहेगा। पर पहले "चाहिए" को पूरी तरह समझ लीजिए — महात्मा भी भोजन मांगते थे, बिस्तर मांगा, रास्ता पूछा; पर किसके लिए? लोगों के लिए, क्योंकि उन्हें काम करना था। एक रिटायर्ड टीचर ने कहा अध्यात्म कुछ शब्दों में बता दो — मेरे अंदर से निकला: उम्मीद से मुक्त करा लो, बस। यह अध्यात्म का आखिरी शब्द है; पर अभी आप उस लायक हो या नहीं, यह देखना है। यात्रा ऐसे है: पहले "अपने तरीके से चाहिए" से छुड़ाओ — सीधा "चाहिए" से नहीं निकल सकते। फिर "चाहिए" (जरूरत) में आओगे — कपड़ा, भोजन, मकान, जितने में जी सको, बस उतना; उतने में साधना करो, सत्कर्म होगा, विकारों से धीरे-धीरे हटोगे। "चाहिए" ज्यादा दिन टिकेगा नहीं, और एक समय आएगा कि अब कुछ भी नहीं चाहिए — उसके बाद होता है आत्मज्ञान। बाहर के रूप से छूटकर अपने पिंड में आते हो तो आत्मज्ञान, और इस पिंड से मुक्त होते हो तो ब्रह्मज्ञान।

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वीडियो: योगीजी की आत्मकथा अज्ञान से ज्ञान तक खोज में कुछ अनुभव की बातें ! #yogijikasatsang #pratyakshgyan · 2024-08-25