प्रश्नोत्तर P18-0023 · भाग 18
गुरु जी, समाज और परिवार के जो दायित्व मिले हैं, उनसे हटना तो आसान है — घर छोड़कर भाग जाओ, एकांत में बैठ जाओ। पर क्या इससे दायित्व से परे हो जाते हैं?
शरीर से छोड़ा, मानसिक कहां छोड़ा? मानसिक छूट जाए तो बड़ी बात है। हिमालय में बैठने वाले कई चिलम, सुल्फा, चरस पीकर कहते हैं हम सीधी बात करते हैं — कब तक? जब तक नशा रहता है। शरीर से छोड़कर भागने से कुछ नहीं होता; यह मानसिक यात्रा है, शारीरिक नहीं। वे आवेश-जज्बात में निकल गए, समझ से निकले ही नहीं, और "कुछ" के लिए निकले थे। जो "कुछ नहीं" में निकलता है, "कुछ नहीं" में साधना करता है, वही आगे बढ़ पाता है। शुरुआत बहुत मायने रखती है — किस भाव से भक्ति या साधना शुरू की। "भावे विद्यते देवा" — भाव में ईश्वर का वास है। वाल्मीकि जी "मरा-मरा" कहकर ब्रह्म में समा गए, जबकि आज "राम-राम" कहकर लोग नहीं पहुंच पा रहे — क्योंकि उन्होंने सब छोड़कर, पहुंचने के लिए उपयोग किया था।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: योगीजी की आत्मकथा अज्ञान से ज्ञान तक खोज में कुछ अनुभव की बातें ! #yogijikasatsang #pratyakshgyan · 2024-08-25