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प्रश्नोत्तर P17-0168 · भाग 17

गुरु जी, आत्मज्ञान होने के बाद क्या व्यक्ति दोबारा उस बोध से वंचित हो सकता है, या फिर से इच्छाओं के कारण संसार के बंधन में फंस सकता है — जैसे पहली बार मूल से अलग हुआ था? और अगर फिर फंस सकते हैं तो ऐसी मुक्ति का क्या फायदा?

वो उसके ऊपर है। पहली बार भी तो हम उसी (मूल स्थिति) में थे। जैसे कैदी बाहर निकलने की यात्रा करता है, और निकलकर इतना स्वतंत्र है कि चाहे तो फिर अपराध करके अंदर चला जाए। अगर ऐसी स्वतंत्रता न हो तो आप कहीं के गुलाम हो गए — आप इतने स्वतंत्र हो कि जो चाहे करो। और यही आजादी हम मूर्खों को मिल गई, जैसे गंजे को कंघी दे दो तो सिर खुजा-खुजाकर लहूलुहान कर ले। (जो पूछे कि फिर तो संसार ही भोगें —) भोगते रहो, आपके लिए वही सही है; नहीं तो अपना कल्याण करो, निकल लो।

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वीडियो: मूल से मेरा हटना कैसे हुआ ? रविवार प्रश्नोत्तरी #योगी · 2025-12-21