प्रश्नोत्तर P17-0064 · भाग 17
गुरु जी, हम दूसरों के दर्शन और भोग-भोजन के लिए इतने व्याकुल क्यों रहते हैं, और इससे कैसे निकलें?
जो दूसरों के दर्शन के लिए हम व्याकुल हैं, काश आत्मदर्शन के लिए व्याकुल हो जाते। दूसरे के लिए इसलिए व्याकुल हैं कि वहां से शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श — कोई कामना पूरी होती है; एक हुई तो व्याकुल, दो हुईं तो और बढ़ गया, पांचों में तो एकदम पागल। पांचों सुख या तो मां से मिलते हैं (स्तनपान में) या नर-मादा के मिलन में; चार भोजन में मिलते हैं। इसलिए सबसे ज्यादा हम भोग और भोजन के लिए व्याकुल हैं — इसी में जीवन लगा दिया, फिर भी ना भोजन की इच्छा पूरी हुई ना भोग की। इसे कभी पूरा नहीं कर सकते क्योंकि यह क्षणिक है: पेट भरने तक स्वाद अच्छा लगा, हार्मोन है तब तक भोग अच्छा लगा, ऊर्जा गई तो अच्छा नहीं लगता, फिर ऊर्जा आई तो फिर अच्छा लगने लगा — यही चक्र चल रहा है। इसे समझकर ही छोड़ सकते हो।
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वीडियो: अद्भुत सत्संग ईश्वरी कृपा एकाकार / #योगीजी_का_सत्संग · 2024-09-21