प्रश्नोत्तर P17-0024 · भाग 17
तो क्या आज से मैं जो भी कर्म करूं, उसके पीछे यही भाव बनाऊं कि इस कर्म का जो परिणाम मिलेगा, उसमें मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए?
हां, पहले लक्ष्य बनाना है कि बस मुझे अब आत्मज्ञान चाहिए — एक यही लक्ष्य है; और अब मेरे द्वारा कोई भी कार्य होगा तो इसी के लिए होगा, और आप कार्य में देख पाओगे कि मुझे सच में कुछ नहीं चाहिए। कभी-कभी परिस्थितियां भी आएंगी — क्या इस काम के बदले भोजन चाहिए, व्यवस्था चाहिए? उस समय पता चलेगा; मेरे साथ ऐसा हुआ है। मैंने हमेशा व्यवस्थाओं को छोड़ दिया — तन पर बिस्तर नहीं, पेट में भोजन नहीं, चलने को शरीर में ताकत नहीं, फिर भी मैं चल दिया। या तो लक्ष्य पर पहुंच कर रुकूंगा, या चलते-चलते खत्म हो जाऊंगा — मैं दोनों में तैयार था; मुंह लक्ष्य की तरफ होगा, पीठ कभी नहीं। लक्ष्य की तरफ बढ़ते हुए सामने से कुछ आया तो जरूरत में उपयोग किया, लेकिन व्यवस्था के लिए कभी पीछे नहीं मुड़ा। एक बार मुड़ गए तो वेग, उत्साह सब खत्म हो जाएगा; और मुड़ के जिसका लोगे, उसे देना भी पड़ेगा, क्योंकि तुम अपने लिए मुड़े हो — फिर फंस गए, और यही भाव दोबारा बनाने में न जाने कितने जन्म लग जाएं। जो तुम्हारे लक्ष्य की ओर बढ़ने में आके सहयोग दे रहा है, तब देने की बात ही नहीं; लक्ष्य पर पहुंच जाओगे तब दोगे। बहुत उतार-चढ़ाव आए, लेकिन मैंने अपना साथ कभी नहीं छोड़ा; इस शरीर का साथ नहीं दिया, क्योंकि मालूम था ये नाश हो जाएगा — बचा तो ठीक, नहीं बचा तो भी ठीक, मैं तो हूं ना। ना इसे नाश करने का प्रयास, ना इसे बचाने के चक्कर में अपने आप को खोना। डर आया, भय आया, लेकिन मैंने डर-भय का साथ नहीं दिया — मैं सिर्फ अपना साथ दूंगा। मुझे अपना काम ईमानदारी से करना है, बस बात खत्म। मुझे आनंद भी नहीं चाहिए — आनंद मुझसे है तो मुझे क्यों चाहिए? "चाहिए" मतलब बाहर है। मुझे सिर्फ मैं चाहिए। बस इस भाव को प्रबल करते रहना है, और हर पल चेक करते रहना है कि क्या मैं अपना साथ छोड़ तो नहीं रहा? जैसे ही मैंने किसी भी चीज को महत्व दिया — डर को ही — तो मैंने अपना साथ छोड़ा।
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वीडियो: आखिर तेरा क्या होगा ? #योगी · 2026-01-11