प्रश्नोत्तर P16-0103 · भाग 16
मतलब मेरा बल क्या है? मेरी जो छोटी-मोटी समझ है, वही मुझे अटकाए हुए है?
आपका धन, आपका शरीर, आपकी समझ — ये आपका बल है। और ये जब तक आपके पास रहेगा, आपको ज्ञान नहीं होगा। तो गुरु आपके बल को खत्म करता है, क्योंकि जब आपका बल खत्म होगा तब आप अपने आप में स्थिर हो जाओगे। जब तक आप में बल है, आप बाहर ही घूमते रह जाओगे। इसलिए आप जितना बोलते हो, गुरु सबको खत्म कर देता है। गुरु यही बताता है कि तुम कुछ नहीं जानते, क्योंकि जब तक तुम कुछ जानते हो तब तक भटकते रहोगे। गुरु तुम्हें जानने से मुक्त कराता है, तुम्हारी सारी समझ को खत्म कर देता है। क्योंकि जब तक आपका बल है, आपके लिए संसार है। गुरु आपको उस जगह भी भेजेगा जहां आपको अथाह पीड़ा होगी, क्योंकि अथाह पीड़ा में ही आपका बल खत्म होगा। अथाह दुख होगा, अथाह अपमान होगा, क्योंकि जब तक आपको मान मिलेगा तब तक आपका बल एकदम खत्म नहीं होगा। अगर आप अपनी समझ से गुरु को देखो तो गुरु आपके लिए एक बेवकूफ हो जाएगा — कि इससे ज्यादा तो मैं जानता हूं, मुझे बैठना भी आता है, उठना भी आता है, यह तो एक गंवार की तरह रहता है, इससे अच्छा काम तो मैं कर सकता हूं। इसलिए गुरु के पास इसलिए जाइए कि अपनी समझ से मैं कैसे मुक्त हो जाऊं। गुरु के पास आप अपनी समझ विकसित करने मत जाओ, क्योंकि अपनी समझ तो आप अपनी समझ से ही विकसित करोगे। गुरु के पास इसलिए जाओ कि मेरी समझ से मुझे मुक्त करो, यह मेरी समझ ही मेरे दुखों का कारण है। जितना इसको विकसित करूंगा उतना दुख बढ़ेगा। आज मैंने अपनी समझ से ही अपने को वहां ला के खड़ा कर दिया जहां मैं अशांत हूं, दुखी हूं, निराश हूं, व्याकुल हूं, घुटन में हूं, बेचैनी में हूं। तो मेरी समझ से मुझे मुक्त करो, और यह तुम ही कर सकते हो, क्योंकि मेरे पास ये क्षमता नहीं है; मुझे क्या करना है वो बोलो। इसीलिए गुरुओं के पास बहुत कम लोग टिकते हैं — जाते लाखों लोग हैं, टिकते इक्का-दुक्का हैं। कौन टिकता है? जो अपनी समझ से मुक्त होना चाहता है। जितने लोग अपनी समझ से गुरु को जांचते हैं या समझ को विकसित करना चाहते हैं, वो वापस चले जाते हैं। और जो कहते हैं कि बस अब मैं अपनी समझ से भी मुक्त होना चाहता हूं, क्योंकि जितना मैंने समझा उतना मैं भटका — वो टिक जाते हैं और उनका कल्याण हो जाता है। इतिहास में देखिए — कृष्ण, अष्टावक्र, गुरु नानक जी, कबीर, बुद्ध — उनके पास गिनती के लोग रुके। जब वो जीवित थे तब कम रुकते हैं; जब वो चले जाते हैं तो भीड़ इकट्ठी हो जाती है, क्योंकि उनके नाम से लोग अपने मैं को खड़ा करते हैं, व्यापार करते हैं। वो उनके ज्ञान का प्रचार नहीं करते, उनके ज्ञान पे चलते भी नहीं; प्रचार भी इसलिए करते हैं कि नाम, शोहरत, पैसा मिलता है। अगर उनके प्रति जरा सी भी आस्था, समर्पण होता, तो उनके ज्ञान के द्वारा उस स्थिति पर होकर ज्ञान देता, रटी-रटाई बात कभी नहीं बोलता। क्योंकि ज्ञान देने का अधिकारी वही है जो ज्ञान को उपलब्ध हो जाए।
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वीडियो: तेरी परीक्षा ही तेरा उद्धार करेगी । #योगी · 2025-10-18