आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P15-0194 · भाग 15

शरीर के सुख-दुख से ऊपर जाने की क्रिया क्या है?

अपने तरीके से कुछ भी चाहिए, उसका त्याग कर दो। भोजन जीने के लिए खाओ — जितने में जी सको; चर्बी बढ़ाने के लिए मत खाओ। कितना चाहिए, वह शरीर बताएगा। जब व्यक्ति उतना खाता है जितने में जी सके, तो उसकी जितनी चर्बी है वह शरीर खुद खा लेता है; शरीर एकदम हड्डी हो जाता है — मैंने ऐसी साधना की है। यह कहना बड़ा आसान है; जरा सा सिर दर्द होता है तो तुरंत टेबलेट खोजने लगते हो, जरा सा बुखार होता है दवा खोजने लगते हो, और बोलते हो मैं तो विदेह में चला गया हूं। जब स्थिति आती है तो आदमी तुरंत विचलित हो जाता है। इसलिए ज्यादा उतावला मत हो — इतना तेज मत दौड़ो कि मुंह के बल गिर जाओ, और इतना स्लो मत चलो कि कहीं पहुंच ना पाओ। ढोल को इतना मत पीटो कि फट जाए, और इतना ढीला मत करो कि बजे ही ना — मध्यम। किस तरीके से संगीत निकल सकता है, किस तरीके से मैं सध सकता हूं, किस तरीके से मेरी समझ बढ़ सकती है — उस तरीके से जीवन जीना है। आवेश में, जज्बात में आके कुछ नहीं बोलना है। पहले सुनो, गुनो, फिर धुनो — यह प्रक्रिया है।

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वीडियो: कोई प्रश्न ना होने के बाद कौन सा प्रश्न होना चाहिए ? #yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान · 2026-06-16