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प्रश्नोत्तर P15-0121 · भाग 15

तो गुरुदेव, ये संसार की तरफ, संसार की चीजों की तरफ कौन लेके जाता है?

आपकी जरूरतें — शरीर की जरूरतें। वो मन नहीं है जो हमें संसार में ले जाता है; आपकी जरूरत लेके जाती है। आप मोबाइल-कंप्यूटर चलाते हैं, कोई फाइल खोलनी होती है, कोई वीडियो देखना होता है — तो एरो आपको उस तक लेके जाता है कि आप एरो को लेके जाते हो? आप ही ले जाते हो। वैसे ही जब शरीर की जरूरत हुई, तो जितनी जानकारी उसके पास है, उसका पता मन आपको बताने लगेगा। खाली बैठे बेचैनी होने लगी, तो पिक्चर देखने की इच्छा किसकी है — मन की कि आपकी? आपकी। मन तो बस इंगित कर रहा है कि आपका पिक्चर देखने का मन है, और जहां-जहां जानकारी होगा कि मिल सकता है, वह पता बताता है। मन के पीछे है कौन? आप हो। शब्द, रूप, गंध, रस और स्पर्श — जब भी इस शरीर को चाहिए, तब मन इंगित करेगा कि आपने कहां-कहां जानकारी इकट्ठा की है। और वह उतना ही बताता है जितना आपको मालूम है — या तो वर्तमान में बहिर्मुखी, जितना देख-सुन-सूंघ-चख-छू सकते हो, या जितना इंद्रियों द्वारा आपने संचित किया है, अचेतन मन में जमा है। आपको फिल्म देखने की इच्छा हुई, और उसी समय जिससे आप सालों से प्रेम करते थे वह सामने आ जाए, तो फिर फिल्म कहां गई? इच्छा आपकी है, दोष हम मन का देते हैं। मन तो आपका सहायक है: अगर मन ना बताए कि भूख लगी है, नींद आ रही है, थक गए हो — तो आप शरीर का दुरुपयोग कर लोगे, बेहोश होके गिर जाओगे। जो हमारा सबसे बड़ा मित्र है, भीड़ में भी भूख याद दिला देता है, उसी को लोगों ने आपसे सबसे बड़ा शत्रु मनवा दिया। मन का बस इतना काम है इंगित करना, जैसे एरो का काम है जाके क्लिक कर देना; अंदर क्या है, क्या खुला, यह आपको देखना है। ना उस पार जाना है ना इस पार; समझ के जीना है। आपके सामने दो ऑप्शन आते हैं — उचित और अनुचित, ईमानदारी और बेईमानी। ईमानदारी और सत्कर्म पकड़ के निकल लो। बेईमानी पकड़ी तो दुष्कर्म चालू हो गया, क्योंकि बेईमानी में किसी का शोषण ही करोगे — शारीरिक या मानसिक; तो आपका पतन हो जाएगा। क्या करने से क्या परिणाम आएगा, वो देख लो; परिणाम तो आना ही है, जो बीज बोगे उसका फल आपको ही काटना पड़ेगा। अपने आप को धोखा मत दो।

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वीडियो: हमारी स्मृतियां कब संस्कार बनती हैं ?#प्रत्यक्षज्ञान #yogijikasatsang #साधना #आध्यात्म · 2026-08-11