प्रश्नोत्तर P15-0018 · भाग 15
हम इतनी पूजा-भक्ति करते हैं, इतने भाव से करते हैं, लेकिन हमें दुख क्यों है?
आपको पता है पूजा किसलिए करनी चाहिए? आप कहते हो शांति मिले, दुख दूर हो। अशांति कहाँ से आई है? जो आपने किया उससे आ रही है — गलत काम, जो नहीं करना था। तो गलत काम छोड़ दो, शांति आ जाएगी; इसमें पूजा-पाठ से क्या मतलब? पूजा-पाठ का मतलब होता है "कुछ नहीं चाहिए"। अगर कोई इष्ट बना लिया तो उससे प्रार्थना करनी है कि मुझे निर्विकार होने की शक्ति दो, और उसके लिए कर्म करना पड़ेगा, क्योंकि कर्म करके हमने विकार धारण किया है। ताला जिस चाबी से बंद होता है उसी से खुलता है; कर्म करके गंदा किया है तो कर्म करके ही शुद्ध कर सकते हैं। पूजा अगर "चाहिए" के लिए कर रहे हो तो उस पूजा का कोई मतलब नहीं। अगर किसी को इष्ट मानते हो तो उसके चरित्र को भी अपनाना पड़ेगा, और साथ में पूरी तरह ईमानदारी और सत्कर्म अपनाना पड़ेगा, तब पूजा-पाठ का मतलब है। नहीं तो पूजा-पाठ करके और भटक जाओगे, अपना पतन कर लोगे। सर्वप्रथम ईमानदारी, सत्कर्म, बाद में पूजा-पाठ।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: इतनी पूजा पाठ भक्ति करते हैं लेकिन दुख क्यों आते हैं ? #प्रत्यक्षज्ञान #yogijikasatsang #आध्यात्म · 2026-08-10