प्रश्नोत्तर P14-0179 · भाग 14
यजुर्वेद में लिखा है कि परमात्मा सारे पाप नाश कर देता है — अपना किया, पितरों का किया, जाने-अनजाने में हुआ — तो आप कहते हैं भोगना पड़ेगा, इसका भाव क्या है?
आगे-पीछे भी कुछ लिखा होगा; हम एक लाइन उठा लेते हैं और पूरा छोड़ देते हैं, इसी से गड़बड़ होती है। परमात्मा पाप नाश करेगा, लेकिन परमात्मा तक पहुँचेगा तब ना; बिना पहुँचे नहीं। और पहुँचते-पहुँचते भोग लेगा, तभी पहुँचेगा — तो पाप बचा कहाँ? जैसे बुद्ध के पास अंगुलिमाल डाकू पहुँचा, शस्त्र छोड़ दिए, भिक्षु बन गया; पर जब गाँव में भिक्षा माँगने गया तो सबने पत्थर मारे, उसने किसी पत्थर का जवाब नहीं दिया। उसने पश्चाताप की आग में, लोगों की मार खा के अपने कर्म का परिणाम भोगा और फिर आगे बढ़ा। मिलेगा जरूर, लेकिन भोगना पड़ेगा। जैसे कई डाकुओं की सजा संविधान ने माफ की, क्योंकि देखा गया कि वो बनाए गए थे; किस स्थिति-परिस्थिति में अपराध किया, वो देखा जाता है। गीता में भी भगवान कहते हैं कि अपने कृत का फल भोगना पड़ेगा। माफी किसी कर्म की नहीं है; हाँ, सच्चे सतगुरु की शरण में आ गए तो जहाँ मुंडी कटनी होगी वहाँ सुई लग के रह जाएगी।
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