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प्रश्नोत्तर P14-0087 · भाग 14

गुरु जी, अब तो बस अपने में टिक जाना है, पर इच्छा तो अभी भी आती-जाती दिखती है — आज सुबह आपको ठंडा शर्बत पिलाने की बात मन में आ गई।

आ गई तो आने दीजिए। संकल्प नहीं लेना है कि मुझे यह करना है। संकल्प बस इतना लेना है कि मुझे कैसे भी निर्विकार हो जाना है, अपने अस्तित्व को पहचान लेना है, और बाहर की बनाई हुई पहचान मिटानी पड़े तो मिटा देंगे — जो था और रहेगा, उस स्थिति में पहुंच जाना है। जो हो जाए स्वाभाविक — इंद्रियों द्वारा जब भी कुछ होगा, किसी की सेवा होगी, निस्वार्थ, निष्काम, निष्कपट, बिना इच्छा-अपेक्षा, बिना लाभ-हानि, बिना पाप-पुण्य का, और बिना संकल्प का होगा। संकल्प लेना है तो बस निर्विकार हो जाने का, पूरी तरह बुराइयों को छोड़ देने का।

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