प्रश्नोत्तर P14-0081 · भाग 14
गुरु जी, पहले अवधारणा थी कि ज्ञान के बाद यह माया समाप्त हो जाएगी, परंतु ज्ञान के पश्चात भी अनुभव हुआ कि माया कार्य करती है — ऐसा क्यों?
तो ज्ञान नहीं हुआ। माया को समझने का प्रयास करिए — संसार माया नहीं है, शरीर की जरूरत है; शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श — इस पिंड में रहना है तो किसी ना किसी तरीके से यह देना पड़ेगा। जब आप अपने तरीके से कुछ कर रहे हो, अपने तरीके में, बेईमानी में फंस गए हो, उसमें उलझन है — उस तरीके से अपने आप को निकाल लीजिए। अगर शब्दों का ज्ञान है और उस शब्द में जी नहीं रहे, तो कोई मतलब नहीं। आजकल वेद-वेदांत की पढ़ाई हो रही है; अगर पढ़ाई से ज्ञान हो जाता तो सम्राट भिक्षुक बनकर गली-गली पात्र लेकर भिक्षा मांग के, अल्पाहार करके साधना क्यों करते? वेदांत का आखिरी मतलब है आवरण से मुक्त हो जाना — अगर वेदांत पढ़ रहे हो और कह रहे हो ये छोटा, ये बड़ा, बड़े आदमी को अलग कुर्सी और वैभव से छोटे को दूर बिठाते हो, तो क्या वेदांत को समझा? ऐसा ज्ञान आपका पतन करेगा। जहां भी हो, अपना काम करते हुए एक-दो घंटा एकांत में जाकर चिंतन-मनन करो, सत्संग सुनो और उन शब्दों में जीना चालू करो, तब कुछ होगा। इसीलिए कहा गया है जीवंत गुरु खोजो, जो उसमें जी रहा हो। अध्यात्म खरीदा-बेचा नहीं जा सकता; आज ध्यान का, मेडिटेशन का धंधा हो गया है। ध्यान प्राकृतिक है — समझने में समर्पण होता है, करने में अहंकार।
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वीडियो: ईश्वर सर्वव्यापी है इसका क्या मतलब है / #ईश्वर #सर्वव्यापी · 2024-04-10