प्रश्नोत्तर P14-0056 · भाग 14
गुरु जी, परमात्मा ने ये पूरा ब्रह्मांड रचा है। मुझे लगा कि जब हम में समझ आ जाती है, हम काबिल हो जाते हैं, तो वो हमारे अंदर पैदा होता है — जैसे गर्भवती स्त्री की डिलीवरी — क्या ऐसा कुछ है?
उस परम सत्यता से हम हैं, हमसे वह नहीं। वो तो था, है और रहेगा, तो पैदा होने का सवाल नहीं है। जब आप खत्म हुए, तब। आप कहीं और थे, वो पहले से था। लगाव तो सिर्फ कामनाओं का है — कामनाएं हटा दो, बात खत्म, दोनों एक हो गए। जैसे सामने पेड़ पर फल दिख रहे हैं — जब तक नहीं चाहिए था, सारे फल थे; जैसे ही लेने लगे — ये कच्चा, ये पक्का, ये सड़ा, ये छोटा, ये बड़ा — हो गया राग-द्वेष। जब तक नहीं चाहिए, अद्वैत; जब चाहिए, द्वैत। बूंद सागर नहीं बनी, सागर पहले से मौजूद था, बूंद सागर में समा गई — बूंद का अस्तित्व नहीं मिटा, दायरे का अस्तित्व मिटा। ये बूंद को पता है, सागर को पता है, तीसरे को नहीं पता। और जब तक कुछ भी चाहिए, तब तक तीसरे बने रहोगे।
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वीडियो: इतने सरल ज्ञान को इतना रहस्यमय क्यों बना दिया गया | Why is Simple Truth made so Mysterious? in Hindi · 2026-03-06